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गुरुवार, सितंबर 06, 2012

जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद



जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद 
जो शब् होकर के खफा आयी है शायद
 
लो, अब खामोश तहरीर हो गयी है वो 
हाँ, ख़त मेरे सब जला आयी है शायद 

के अब रात-रात भर यादों में जागते हैं 
काम कुछ तो मेरी दुआ आयी है शायद 

सच कह कह के सबसे उलझते रहना 
मेरे हक में ये ही सज़ा आयी है शायद 

महक उठे हैं खुशबू से हजारों आलम
उसके गेसू छू के हवा आयी है शायद 

होगी आरज़ू भी मुक्क़मल ''राज़'' की 
खुदा की अब तो रज़ा आयी है शायद 

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (08-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत खूब !

    बहुत कुछ कर के भी आ गई
    कोई बात नहीं होता है ऎसा भी
    अच्छा लगा सुनकर
    आखिरकार वो आ गई

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  3. आप सभी का हार्दिक आभारी हूँ....

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  4. आभार आप सभी का... यूँ ही हिम्मत बढ़ाते रहें... शुक्रिया

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  5. बेनामी13 फ़रवरी, 2013

    behtaeen, bahut umdaa likha hae..aankho ke saamne yado ke manzar chal pade...

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