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मंगलवार, अप्रैल 06, 2010

वो था तो ये घर, घर जैसा था


वो था तो ये घर, घर जैसा था 
वरना दश्त-ए-सफ़र जैसा था 

तारीकियों का मौसम आज है 
कभी चाँद हमसफ़र जैसा था 

हवा को हाथों में समेट लेना 
बचपन में तो हुनर जैसा था 

नींद से जान के ना उठना वो 
ख्वाब टूटने का डर जैसा था 

मेरी वफाओं पे जफा उनकी 
कुछ इनायते-नजर जैसा था 

पत्ते जुदाई मांग बैठे जिसके 
मैं तो बस उस शजर जैसा था

7 टिप्‍पणियां:

  1. shukirya Aashu bhai.......aise hi hausla dete rahe.....

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना है.कमाल की.बहुत पसंद आयी.

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  3. हवा को हाँथ में समेट लेना ,....

    एयर..पत्ते जुदाई मांग बैठे

    वाह जी कमाल कर दित्ता :)

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  4. Deepak bhai saab......Venaus bhai ji.....

    Aap dono ka haardik shukrgujaar hu....jo aap yaha tak aaye....aise hi hausla dete rahiye...

    उत्तर देंहटाएं

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