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बुधवार, जनवरी 13, 2010

उसके जाने पर भी लौटने का इम्काँ रह जाएगा



के मिट जाएगा हर जख्म पर निशाँ रह जाएगा
उसके जाने पर भी लौटने का इम्काँ रह जाएगा

वो बेवफा नहीं था शायद मजबूर रहा होगा बहुत
टूटते दिल को ये भी कभी कभी गुमाँ रह जाएगा

छीन के जमीं मेरी वो मुझे बेमुकाम तो कर देगा
पर दुआओं में उसके लिए आसमाँ रह जाएगा

अपने अश्क यूँ ही किसी पे जाया ना करना तू
ज़माने भर में बिखरी ये बस दास्ताँ रह जाएगा

गर तुम्हारे जैसे जिन्दगी जीना सीख गए हम
हमारे बाद ना किसी का नामो निशाँ रह जाएगा

जाते जाते तुम अपनी यादें वहां छोड़ देना जरा
नहीं तो उम्र भर तड़पता मेरा मकाँ रह जाएगा

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