लोकप्रिय पोस्ट

शुक्रवार, अक्टूबर 12, 2012

ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को...




जब होंगे लोगों के दिल में वलवले मचलने को 
आ जायेंगे वो भी इन्कलाब के रस्ते चलने को 

ऐ सियासतदानों जरा तुम मुड़ कर के तो देखो 
ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को 

बरसों बरस से तुमने तो यहाँ बहुत धूप है सेंकी  
बढ़ रहा है अब मगर दिल्ली का सूरज ढलने को 

लेकर आयेंगे कुछ चराग हम इस नयी सदी से  
जो तैयार होंगे तूफ़ान के साए में भी जलने को 

आ गया है कुछ नया सुरूर अबके तो हवाओं में
तभी तो हर शख्स बेताब है घर से निकलने को

किसी पत्ते ने भी उससे तो रफाकात ना निभायी
शज़र छोड़ आये वो तन्हा पतझर में उबलने को 

यादों की बर्फ पे "राज़" करी है लफ़्ज़ों की गर्मी
 दो चार ग़ज़लें तो है बस अब यूँ ही पिघलने को   

शनिवार, सितंबर 29, 2012

उसकी यादों में आये इतवार तो अच्छा हो....



दर्द का रुक जाए ये कारोबार तो अच्छा हो 
उसकी यादों में आये इतवार तो अच्छा हो

फिर वो मेरे गम, मेरी वहशत को समझेगी
उसे भी गर होये ये मुआ प्यार तो अच्छा हो 

जितने भी हैं गिले शिकवे उन्हें बचाए रखिये
मोहब्बत में रहे जो कुछ उधार तो अच्छा हो 

जिसकी आमद से रौशन ये चराग होने लगें 
घर आये वो शाम अब के बार तो अच्छा हो 

ये खिज़ा का मौसम कब तलक रहे यूँ जवाँ
इन गलियों से भी गुजरे बहार तो अच्छा हो 

उखड़ती हुयी हर सांस बस ये सोचती होगी 
के मर ही जाये अब ये बीमार तो अच्छा हो 

कासे में कुछ ना डालो मगर वो दुआयें देता है
फकीर जैसा हो अपना रोजगार तो अच्छा हो 

कुछ भले बदले ना बदले इस मुल्क में मगर 
बदल जाये दिल्ली की सरकार तो अच्छा हो

अजीब शख्स हो "राज़" जो गम में हँसते हो 
तुम जैसा हो गर कोई फनकार तो अच्छा हो 

शनिवार, सितंबर 22, 2012

चोट पानी जब करता है तो पत्थर टूट जाते हैं



हौसला जज्ब में रखिये तो सब डर टूट जाते हैं 
चोट पानी जब करता है, तो पत्थर टूट जाते हैं

ये किस्मत में खुदा ने क्या है लिख दिया अपनी 
नज़र जिनपे है जा टिकती वो मंजर टूट जाते हैं 

बात इन्सान की हो या, हो फिर इन दरख्तों की 
जिन्हें झुकना नहीं आता वो अक्सर टूट जाते हैं 

बरक़त दूर से ही ऐसों को छू कर के गुजरती है 
बिना माँ के जो होते हैं,  वो सब घर टूट जाते हैं 

मुहब्बत की बीमारी ने जिन्हें आकर के है घेरा 
ठीक बाहर से दिखते हैं पर वो अंदर टूट जाते हैं 

किसे है वक़्त के मंदिर-मस्जिद की जरा सोचे 
कमाने भर में ही सब के काँधे-सर टूट जाते हैं 

''राज'' पलकों में अपनी आप, ख्वाब ना रखिये 
सहर जब आँख मलती है ये गिरकर टूट जाते हैं 

गुरुवार, सितंबर 20, 2012

कोई अशआर नहीं हूँ.....


इश्क में मर जाऊं, इतना बीमार नहीं हूँ 
चाहता हूँ तुझे पर तेरा तलबगार नहीं हूँ 

यूँ तो मुश्किल नहीं है, समझना मुझको 
पर हर कोई पढ़ ले मुझे अख़बार नहीं हूँ 

मैं चंद लफ़्ज़ों में सिमट जाऊं मगर कैसे 
इक लंबी दास्ताँ हूँ कोई अशआर नहीं हूँ 

मेरे सच से गर आप खफा हैं तो हो जाएँ    
चापलूसी के फन का मैं, फनकार नहीं हूँ 

अपने लफ़्ज़ों में हूँ आफताब समेटे हुए 
तुम्हारे जैसा जुगनू का किरदार नहीं हूँ 

रंज है मुल्क के सियासतदानों से मगर 
असीम हो जाऊं मैं, इतना गद्दार नहीं हूँ *

जानता हूँ के, ये लहजा नहीं पसंद तुम्हे
तुम्हे समझाऊं, इतना समझदार नहीं हूँ 

मेरी इबादतों का सिला नहीं देता है खुदा 
क्यूँ मैं अपनी आरज़ू का हकदार नहीं हूँ 

***************************************
* 'असीम'....एक कार्टूनिस्ट....
 जिसने भारत के संविधान एवं संसद की गरिमा
भंग करते हुए कुछ कार्टून बनाये, जिसके फलस्वरूप 
उसको कुछ दिनों की जेल की सजा हुयी... 

गुरुवार, सितंबर 06, 2012

जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद



जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद 
जो शब् होकर के खफा आयी है शायद
 
लो, अब खामोश तहरीर हो गयी है वो 
हाँ, ख़त मेरे सब जला आयी है शायद 

के अब रात-रात भर यादों में जागते हैं 
काम कुछ तो मेरी दुआ आयी है शायद 

सच कह कह के सबसे उलझते रहना 
मेरे हक में ये ही सज़ा आयी है शायद 

महक उठे हैं खुशबू से हजारों आलम
उसके गेसू छू के हवा आयी है शायद 

होगी आरज़ू भी मुक्क़मल ''राज़'' की 
खुदा की अब तो रज़ा आयी है शायद 

मंगलवार, अगस्त 21, 2012

नींद रात रानी हो गयी



हिज्र की कलियाँ वो चटखी, नींद रात रानी हो गयी 
यादों का बरसा अब्र और चश्मे-रुत सुहानी हो गयी 

टूटे-बिखरे ख्वाब और किताबों में मुरझाये गुलाब 
मेरे हक में ये मुहब्बत की अच्छी निशानी हो गयी 

हमने जो उनको कही थी, वो बात तो कुछ और थी 
उन तलक पहुंची तो कुछ की कुछ कहानी हो गयी

चारा-ए-दिल उनका हकीम करते भी तो क्या भला  
मर्ज-ए-इश्क की जिन जिन पर मेहरबानी हो गयी

चूम कर बाद-ए-सबा को जब आफताब चल दिया 
शर्म से ये खाक ज़मीं की फिर पानी पानी हो गयी 

यूँ बंदिशें मगर सोलहवे में अच्छी नहीं लगती उसे 
पर माँ उसकी जानती है के लड़की सयानी हो गयी 

उसके ख्याल के बाद हमे ना ख्याल आया किसी का 
यूँ लगता है जैसे सारी दुनिया से बदगुमानी हो गयी 

मीर-ग़ालिब के मुकाबिल है इस जहाँ में ठहरा कौन 
उनकी तो ग़ज़लों-नज्मों में बसर जिंदगानी हो गयी  

नये कुछ और भी तो मसले उठाओ "राज़" ग़ज़ल में 
के वो बात "आरज़ू" की अब कितनी पुरानी हो गयी 

मंगलवार, अगस्त 07, 2012




मैं तो छुपा लेता हूँ, पर ये बता देता है
मेरा चेहरा मेरे हालात का पता देता है 

वो अहसान फिर अहसान नहीं रहता  
कोई कर के जब सब को सुना देता है  

जब कभी भी रुतबे का गुमाँ आता है 
मेरा माजी मुझे आईना दिखा देता है 

कौन भला उम्र भर साथ देता है यहाँ 
सूख जाएँ तो पेड़ भी पत्ते गिरा देता है 

इन्सां होता है बहरा जहाँ काम ना हो 
जहाँ हो काम वहाँ, कान लगा देता है 

ग़ज़ल की दास्तान होती है खूबसूरत 
ढंग से कोई जो उन्वान निभा देता है 

किस्मत में फतह है तो हो कर रहेगी 
क्या हुआ जो कोई हमे बद्दुआ देता है

यहाँ तो इक आरज़ू भी पूरी नहीं होती  
जाने लोगों को क्या-क्या खुदा देता है   

तुम भी इक अजीब ही शख्स हो "राज़" 
याद उसे रखोगे, जो तुम्हे भुला देता है 

रविवार, जुलाई 29, 2012

इस गम को मात मिल जायेगी...




फिर इस गम को मात मिल जायेगी 
के जब कज़ा से हयात मिल जायेगी 

सब भूल कर के हम भी सोयेंगे बहुत
पुर-सुकून जब वो रात मिल जाएगी  

मैं जितने जवाब खोजूंगा इसके लिए 
जिंदगी ले नए सवालात मिल जायेगी

उसके बेटे भी कमाने लगे है आज-कल 
अब मुफलिसी से नजात मिल जायेगी

उसके लहजे पे जरा गौर करना तुम 
बातों-बातों में मेरी बात मिल जायेगी 

देखना, जिस रोज उसकी '' हाँ '' होगी
मुझको सारी कायनात मिल जायेगी 

सोमवार, जुलाई 23, 2012





कटी पतंग सी अब तो मेरी ज़ात है 
बनते-बनते मेरी हर बिगड़ी बात है 

जो ताउम्र किस्मत के भरोसे पे रहा 
बिसाते-वक़्त में तय उसकी मात है 

मैं उसके लिए बस इक खिलौना था 
वो क्या जाने के वो मेरी कायनात है

खुदा ने कब फर्क रखा था इंसां में 
ये तो हम इंसानों की करामात है 

गुजरेगी कैसे अब सोचते हैं "राज़" 
जिन्दगी तनहा सफ़र की रात है

शनिवार, जुलाई 21, 2012

कभी मीठी तो, कभी है खारी जिंदगी




कभी मीठी तो, कभी है खारी जिंदगी 
सच कहूँ मगर है बहुत प्यारी जिंदगी 

कभी सिसके तो कभी पागलों से हँसे 
तेरी याद में कुछ यूँ है गुजारी जिंदगी 

जीने की हद तक तो तुम जियो यारों 
क्या हुआ जो क़ज़ा से है हारी जिंदगी 

कभी ख्वाब देखते, कभी आरज़ू लिए 
कट रही है बस अब यूँ हमारी जिंदगी 

उसके बगैर भी अपनी तो कटेगी "राज़" 
बस उसे ही रहेगा मलाल सारी जिंदगी