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सोमवार, मई 02, 2011

बे-बात पर ही खफा होगा ''राज़''



बे-बात पर ही खफा होगा ''राज़''
या शायद भूल गया होगा ''राज़''

नाम का ही तो काफिर था बस 
दिल में उसके खुदा होगा ''राज़''

वो शाम छत पे टहल गयी होगी 
चाँद सहर तक जगा होगा ''राज़''

हिचकियाँ रात भर आती रहीं यूँ 
किसी ने याद किया होगा ''राज़''

चल आईने से ही कुछ जिक्र करें 
उसको कुछ तो पता होगा ''राज़''

''आरज़ू'' को सबसे छुपा के रख ले 
नजर लगने का शुबहा होगा ''राज़''

शनिवार, अप्रैल 23, 2011

माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना



माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना 
परदेस जाना तो आँख में घर रख लेना 

कहाँ हासिल है शहर में ये सोंधी खुशबू
साथ गली की खाक मुश्त भर रख लेना 

पोंछ लेना आँखों को अपनी मगर तुम 
कुछ आईनों को भी साफ़ कर रख लेना 

जिंदगी में कुछ काम नहीं आया करता 
हौसलों से भरी कोई रहगुजर रख लेना 

बस छाँव ही नहीं, वो देता है बहुत कुछ 
आँगन में कोई बूढ़ा सा शजर रख लेना 

चाहना टूटकर के जिसे भी चाहना तुम
फासला दरमियाँ थोड़ा मगर रख लेना 

मानिंद-ए-चराग जलना ऊम्र भर को यूँ 
पर कुछ हवाओं का भी तो डर रख लेना 

उसका जिक्र भी हुआ तो महकेगी बहुत 
फिर चाहे ग़ज़ल 'राज़' बे-बहर रख लेना

रविवार, अप्रैल 17, 2011

हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है



देखिये जिसको भी वो रुसवा दिखाई देता है 
हाँ मुझे हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है 

खुबसूरत अब कभी मौसम नहीं होते कहीं 
हद तलक नज़रों में बस सहरा दिखाई देता है 

अब्र की वहशत में वो चाँद जबसे आ गया 
आसमाँ तबसे बड़ा ये गहरा दिखाई देता है 

नासमझ हूँ मैं यहाँ कैसे यकीं कर लूँ कहो
हर नए चेहरे पे इक चेहरा दिखाई देता है  

हिज्र में यूँ ही कहीं जो याद उसकी चल पड़े 
खुश्क आँखों में मेरी दरिया दिखाई देता है 

लुट चला है 'राज़' वो तो इश्क के ही नाम पे 
लोग कहते हैं उसे के पगला दिखाई देता है 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

इक गुनाह सा कर गया कोई



के इक गुनाह सा कर गया कोई
इस दिल से जो उतर गया कोई

उसे बस जाने की जिद पड़ी थी
क्या पता कहीं पे मर गया कोई

हवा ये बहकी बहकी फिरे देखो
शायद यहाँ से गुजर गया कोई

चांदनी शब् भर रोती रही यहाँ
इलज़ाम उसके सर गया कोई

खुद को ढूंढ़ते ये कहाँ आ गया
लौट कर जो ना घर गया कोई

उस गली के चक्कर नहीं लगते
शायद "राज़" सुधर गया कोई

रविवार, अप्रैल 03, 2011

बात निकलेगी.......



मेरी इन आँखों के समंदर की बात निकलेगी 
तब किसी संगदिल पत्थर की बात निकलेगी 

जज्ब-ए-कुर्बानी का जिक्र होगा कहीं पर जब 
देखना यारों के मेरे ही सर की बात निकलेगी 

मौसम-ए-सेहरा में होगा सब आलम ये कैसा 
ना समर, ना किसी शज़र की बात निकलेगी 

मुद्दत से हैं वीरान पड़ी इस शहर की बस्तियाँ 
किन अल्फाजों में मेरे घर की बात निकलेगी 

जब भी छिड़ेगा चर्चा कहीं दोस्तों के नाम का
पीठ मेरी तो उनके खंजर की बात निकलेगी

मेरी वफायें जाविदाँ और तेरी ज़फायें कमाल 
कुछ यूँ अब दोनों के हुनर की बात निकलेगी

और ग़ज़लों में अब नया हम क्या कहें "राज़" 
दिल, धड़कन, रूह, जिगर की बात निकलेगी

मंगलवार, मार्च 29, 2011

लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया



आते-आते उनका आना रह गया 
दरमियाँ गुज़रा ज़माना रह गया 

कटी शब्-ए-इंतजार कुछ यूँ मेरी
के जुगनुओं से दोस्ताना रह गया

थी जिंदगी की हर कहानी बेअसर 
पर लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया 

छोड़ कर आहों के परिंदे उड़ चले 
मौसम कहाँ अब सुहाना रह गया

शनिवार, मार्च 26, 2011

तुझसे कहते कैसे.....



रात अश्कों का आना जाना तुझसे कहते कैसे 
अपने दर्दो-गम का फ़साना तुझसे कहते कैसे

के तुझे फुर्सत नहीं गैरों की महफ़िल से मिली 
कुछ अपना दिल नहीं माना तुझसे कहते कैसे

हुआ ज़िक्र जो यूँ बे-वफाओं का तो खामोश रहे 
नाम तेरा भी था उनमे आना तुझसे कहते कैसे

तेरे गम लिए आँख रखीं पुरनम खुद की हमने 
हंसने का तो था बस बहाना तुझसे कहते कैसे

तेरे ख्यालों से ही थी मुक़म्मल तहरीर अपनी 
था ग़ज़लों का तू उन्वाँ जाना तुझसे कहते कैसे

तर्के-ताल्लुक नहीं कोई मरासिम नहीं ''राज़''
के नहीं रहा अब वो ज़माना तुझसे कहते कैसे

गुरुवार, मार्च 17, 2011

उसकी खुशबू का फिर से पता देती है


उसकी खुशबू का फिर से पता देती है 

ये सबा चलती है मुझको रुला देती है 

वो भी तड़पती है हिज्र में कहीं बहुत 
मेरे बाद जाने किस को सदा देती है 

वो आते हैं जो शाम तो सुकूँ पाती है 
शाख इक-इक परिंदे को दुआ देती है 

जबके गम में जीना सीख लेता हूँ मैं 
क्यूँ याद दर्द के शोले को हवा देती है 

रोया है वो रात भर तन्हाई में कहीं 
'राज़' ये शबनम सबको बता देती है 

गुरुवार, मार्च 10, 2011

बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं



कहाँ अब ये सच्ची इबादत में मिला करते हैं 
बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं 

छल फरेब झूठ से है यहाँ पर जिनका वास्ता 
ऐसे लोग ही बस सियासत में मिला करते हैं 

जिन्हें रखा है कौम की हिफाज़त की खातिर 
वही दंगाइयों की हिमायत में मिला करते हैं 

दोस्त कहके पीठ पे वार करना शगल उनका 
कुछ लोग ऐसी भी शराफत में मिला करते हैं 

जर्द हो मौसम तो खुद ही रास्ता तलाश करिए 
महरो-माह कहाँ ऐसी आफत में मिला करते हैं

रविवार, मार्च 06, 2011

सच बोलता है बहुत....



हाल-ए-दिल यूँ सभी से बताना नहीं यारों 
अपनों से पर कुछ भी छिपाना नहीं यारों 

और रूठा हुआ है वो तो मना लेना उसे भी 
बिछड़े गर तो, होता लौट आना नहीं यारों 

अपनी किस्मत से ही तुम खुश हो रहना 
चादर से ज्यादा पैर को फैलाना नहीं यारों 

महर-ओ-माह की यूँ ख्वाहिश बुरी नहीं है 
पर गैर की चीज़ पे नज़रें उठाना नहीं यारों 

थोडा तल्ख़ है क्यूंकि सच बोलता है बहुत 
" राज़ " की बातें दिल से लगाना नहीं यारों