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रविवार, अप्रैल 17, 2011

हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है



देखिये जिसको भी वो रुसवा दिखाई देता है 
हाँ मुझे हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है 

खुबसूरत अब कभी मौसम नहीं होते कहीं 
हद तलक नज़रों में बस सहरा दिखाई देता है 

अब्र की वहशत में वो चाँद जबसे आ गया 
आसमाँ तबसे बड़ा ये गहरा दिखाई देता है 

नासमझ हूँ मैं यहाँ कैसे यकीं कर लूँ कहो
हर नए चेहरे पे इक चेहरा दिखाई देता है  

हिज्र में यूँ ही कहीं जो याद उसकी चल पड़े 
खुश्क आँखों में मेरी दरिया दिखाई देता है 

लुट चला है 'राज़' वो तो इश्क के ही नाम पे 
लोग कहते हैं उसे के पगला दिखाई देता है 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

इक गुनाह सा कर गया कोई



के इक गुनाह सा कर गया कोई
इस दिल से जो उतर गया कोई

उसे बस जाने की जिद पड़ी थी
क्या पता कहीं पे मर गया कोई

हवा ये बहकी बहकी फिरे देखो
शायद यहाँ से गुजर गया कोई

चांदनी शब् भर रोती रही यहाँ
इलज़ाम उसके सर गया कोई

खुद को ढूंढ़ते ये कहाँ आ गया
लौट कर जो ना घर गया कोई

उस गली के चक्कर नहीं लगते
शायद "राज़" सुधर गया कोई

रविवार, अप्रैल 03, 2011

बात निकलेगी.......



मेरी इन आँखों के समंदर की बात निकलेगी 
तब किसी संगदिल पत्थर की बात निकलेगी 

जज्ब-ए-कुर्बानी का जिक्र होगा कहीं पर जब 
देखना यारों के मेरे ही सर की बात निकलेगी 

मौसम-ए-सेहरा में होगा सब आलम ये कैसा 
ना समर, ना किसी शज़र की बात निकलेगी 

मुद्दत से हैं वीरान पड़ी इस शहर की बस्तियाँ 
किन अल्फाजों में मेरे घर की बात निकलेगी 

जब भी छिड़ेगा चर्चा कहीं दोस्तों के नाम का
पीठ मेरी तो उनके खंजर की बात निकलेगी

मेरी वफायें जाविदाँ और तेरी ज़फायें कमाल 
कुछ यूँ अब दोनों के हुनर की बात निकलेगी

और ग़ज़लों में अब नया हम क्या कहें "राज़" 
दिल, धड़कन, रूह, जिगर की बात निकलेगी

मंगलवार, मार्च 29, 2011

लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया



आते-आते उनका आना रह गया 
दरमियाँ गुज़रा ज़माना रह गया 

कटी शब्-ए-इंतजार कुछ यूँ मेरी
के जुगनुओं से दोस्ताना रह गया

थी जिंदगी की हर कहानी बेअसर 
पर लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया 

छोड़ कर आहों के परिंदे उड़ चले 
मौसम कहाँ अब सुहाना रह गया

शनिवार, मार्च 26, 2011

तुझसे कहते कैसे.....



रात अश्कों का आना जाना तुझसे कहते कैसे 
अपने दर्दो-गम का फ़साना तुझसे कहते कैसे

के तुझे फुर्सत नहीं गैरों की महफ़िल से मिली 
कुछ अपना दिल नहीं माना तुझसे कहते कैसे

हुआ ज़िक्र जो यूँ बे-वफाओं का तो खामोश रहे 
नाम तेरा भी था उनमे आना तुझसे कहते कैसे

तेरे गम लिए आँख रखीं पुरनम खुद की हमने 
हंसने का तो था बस बहाना तुझसे कहते कैसे

तेरे ख्यालों से ही थी मुक़म्मल तहरीर अपनी 
था ग़ज़लों का तू उन्वाँ जाना तुझसे कहते कैसे

तर्के-ताल्लुक नहीं कोई मरासिम नहीं ''राज़''
के नहीं रहा अब वो ज़माना तुझसे कहते कैसे

गुरुवार, मार्च 17, 2011

उसकी खुशबू का फिर से पता देती है


उसकी खुशबू का फिर से पता देती है 

ये सबा चलती है मुझको रुला देती है 

वो भी तड़पती है हिज्र में कहीं बहुत 
मेरे बाद जाने किस को सदा देती है 

वो आते हैं जो शाम तो सुकूँ पाती है 
शाख इक-इक परिंदे को दुआ देती है 

जबके गम में जीना सीख लेता हूँ मैं 
क्यूँ याद दर्द के शोले को हवा देती है 

रोया है वो रात भर तन्हाई में कहीं 
'राज़' ये शबनम सबको बता देती है 

गुरुवार, मार्च 10, 2011

बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं



कहाँ अब ये सच्ची इबादत में मिला करते हैं 
बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं 

छल फरेब झूठ से है यहाँ पर जिनका वास्ता 
ऐसे लोग ही बस सियासत में मिला करते हैं 

जिन्हें रखा है कौम की हिफाज़त की खातिर 
वही दंगाइयों की हिमायत में मिला करते हैं 

दोस्त कहके पीठ पे वार करना शगल उनका 
कुछ लोग ऐसी भी शराफत में मिला करते हैं 

जर्द हो मौसम तो खुद ही रास्ता तलाश करिए 
महरो-माह कहाँ ऐसी आफत में मिला करते हैं

रविवार, मार्च 06, 2011

सच बोलता है बहुत....



हाल-ए-दिल यूँ सभी से बताना नहीं यारों 
अपनों से पर कुछ भी छिपाना नहीं यारों 

और रूठा हुआ है वो तो मना लेना उसे भी 
बिछड़े गर तो, होता लौट आना नहीं यारों 

अपनी किस्मत से ही तुम खुश हो रहना 
चादर से ज्यादा पैर को फैलाना नहीं यारों 

महर-ओ-माह की यूँ ख्वाहिश बुरी नहीं है 
पर गैर की चीज़ पे नज़रें उठाना नहीं यारों 

थोडा तल्ख़ है क्यूंकि सच बोलता है बहुत 
" राज़ " की बातें दिल से लगाना नहीं यारों 

मंगलवार, मार्च 01, 2011

सबको दुआ दी जाए....



उसकी याद अपने जेहन से मिटा दी जाए 
के इस नादाँ दिल को भी यूँ सज़ा दी जाए 

परिंदों का जबके यहाँ आना नहीं मुमकिन 
क्यों ना दरख़्त की हर शाख जला दी जाए 

शब्-ए-इंतज़ार की देखो तो सहर हो चुकी 
चलो रौशनी चरागों की अब बुझा दी जाए 

निकल आये हैं जब उनकी हदों से दूर बहुत 
उसकी वफ़ा, उसकी खता सब भुला दी जाए 

जब भी इबादत में झुके ''राज़'' सर अपना 
दोस्त हो या दुश्मन, सबको दुआ दी जाए 

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

वस्ल की सदा ना लिखना



हिज्र है मुक्क़दर तो वस्ल की सदा ना लिखना 
जो यूँ चराग बख्शा है तूने, तो हवा ना लिखना 

कब करी ख्वाहिश मैंने किसी खजाने की यहाँ 
मेरी किस्मत तू कुछ उसके सिवा ना लिखना 

मुझे हासिल है दर्द में भी इक लज्जत अब तो 
ऐ खुदा अब कोई खुशियों की सबा ना लिखना 

मिल भी जाए गर मेरी पीठ पे यूँ खंज़र उसका 
के वो है मासूम, उसकी कोई खता ना लिखना 

हम अपनी आँखों को ही जला के रौशनी करेंगे 
मेरी खातिर महर-ओ-माह, दुआ ना लिखना 

निखर आएगा रंग सफहों पे अंदाजे-सुखन का 
नाम उसका ही लिखना, कुछ नया ना लिखना 

यूँ तो ग़ज़ल में मैंने अपने ख्याल उतारे रखे थे 
कुछ पता ना था क्या लिखना क्या ना लिखना 

मज़बूरी-ए-हालात की शायद वो रही थी मारी
कभी तुम "राज़" उसको यूँ बेवफ़ा ना लिखना