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गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

गर तेरी याद जरा टल गयी होती



गर तेरी याद जरा टल गयी होती 
तबियत अपनी संभल गयी होती 

माह आने का जो वादा ना करता  
रात भी चरागों में जल गयी होती 

तेरे ख्यालों से ही हर्फ़ सजे थे मेरे 
वरना कही कब ग़ज़ल गयी होती 

ग़मों ने ही तो संभाला है मुझको 
ख़ुशी होती तो निकल गयी होती 

काबिल मैं ही ना था शायद उसके 
नहीं तो किस्मत बदल गयी होती 

खामोश दरिया सा मैं लौट आया हूँ 
काश तश्नगी जरा मचल गयी होती 

क़ज़ा के खेल में जिन्दगी हार बैठी 
सोचता हूँ एक चाल चल गयी होती 

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

बहार-ओ-खुशबू का सफ़र याद आया



बहार-ओ-खुशबू का सफ़र याद आया 
आज वो मुझे जब ता-सहर याद आया 

भूल जाने की कसम यूँ खाई तो थी मैंने 
पर वादे से अपने गया मुकर याद आया 

बाद मेरे वो किसपे रौब दिखाते अपना 
वो थे आंधी तो था मैं शजर याद आया 

के जब मिलीं सहरा की उजड़ी बस्तियां 
सच है यारों फिर अपना घर याद आया 

पुकार के हर सदा जब नाकाम लौटी थी 
माँ की दुआ में था जो असर याद आया 

हुए खान्मा-खराब "राज़" जहाँ में जब 
वो गली याद आई वो शहर याद आया 

गुरुवार, जनवरी 27, 2011

जेहनो-दिल से जब तेरा ख्याल गुजरे



वो हर इक लम्हा तो जैसे साल गुजरे 
जेहनो-दिल से जब तेरा ख्याल गुजरे 

तेरी यादों में जो कभी शाम हुआ करे 
फिर आँखों से रात भर शलाल गुजरे 

आईने में भी अपनी सूरत दिखी नहीं 
मेरे साथ ऐसे भी बहुत कमाल गुजरे 

मैं चराग हूँ पर हार मानूंगा नहीं यूँ ही 
कह दो इस हवा से अपनी चाल गुजरे 

उसके बाद तो किसी पे नज़रें नहीं रुकीं 
वैसे नज़र से कई हूर-ओ-जमाल गुजरे 

हर बार क्यूँ मैं ही उसको मनाने जाऊं 
मैं रहूँ खामोश तो उसको मलाल गुजरे 

दर्द के सफ़र में कब होगी नसीब मंजिल 
''राज़'' के दिल में बस यही सवाल गुजरे 

बुधवार, जनवरी 19, 2011

दरिया जब समंदर में उतर गया होगा


दरिया जब समंदर में उतर गया होगा 
वो अपने वजूद से ही बिखर गया होगा 

ये शब् के पहलू में नमी कैसी आ गयी 
अश्क ले कर कोई ता-सहर गया होगा 

मानूस नहीं ये दिल यहाँ यूँ ही हुआ है 
वादा आने का कोई तो कर गया होगा 

दिले-गुलशन में अब गुंचे नहीं खिलते 
उनकी याद का तूफां गुजर गया होगा 

खामियां बताने में ये ज़माना कम नहीं 
इल्जाम तो माह के भी सर गया होगा 

अपनी आँखों को ही जलाया होगा ''राज़''
चराग खुशियों का बुझ अगर गया होगा

सोमवार, जनवरी 17, 2011

ख्वाब में ही सही आके तो मिला कर


कभी मुझ पर भी तू इतनी दुआ कर 
ख्वाब में ही सही आके तो मिला कर 

महर-ओ-माह की नहीं दरकार मुझे 
मेरे घर में इक चराग बस अता कर 

थक चुकी है ये शब् तीरगी से बहुत
नसीमे-सहर दे खूबसुरत फ़ज़ा कर 

ना ले थाम हाथों में तू हाथ मेरा पर  
साथ कुछ दूर चलने से ना मना कर 

आजार-ए-इश्क का भी मज़ा ले यहाँ 
अरे इक बार ही सही ये भी खता कर 

सुकूँ उसके ही दर पर ही तुझे आएगा 
चल मस्जिद चल इबादत-ए-खुदा कर 

ज़फ़ा करे वो तो हंस के टाल दे "राज़"
कुछ और ना उनसे वफ़ा के सिवा कर 

रविवार, जनवरी 09, 2011

रात भर........


ख्यालों में आपका आना जाना रात भर  
फिर चश्मे--तर का मुस्कुराना रात भर

हर इक आहट पे है आपकी आमद लगे
मेरा दरवाजे तक नज़रें उठाना रात भर 

आपके पैरहन को छूके जब चली ये सबा 
हरसू खुला जैसे कोई मयखाना रात भर 

हवा, शजर, पत्ते, घटाएं, बेकरार थे सब 
इक मैं ही न था यहाँ पे दीवाना रात भर 

के बज़्म-ए-तन्हाई में चली याद आपकी 
बना लफ्ज़-लफ्ज़ पर अफसाना रात भर 

हद-ए-इंतज़ार में ये चराग भी बेसुध था 
जारी रहा उसका भी लडखडाना रात भर 

अभी तो गज़र का यहाँ पहला ही पहर है 
हुआ खुद को यूँ ''राज़''बहलाना रात भर 

शुक्रवार, जनवरी 07, 2011

इक खुबसूरत सी दुआ 'आरज़ू'


इक खुबसूरत सी दुआ 'आरज़ू' 
दिल से निकलती सदा 'आरज़ू' 

जेहन में जब हो मौसमे-सहरा 
होती है रंगीन ये फिजा 'आरज़ू' 

निशाँ ना रहे तीरगी का यहाँ पे  
हो जब सहर खुशनुमा 'आरज़ू' 

फूल खिल जाएँ महकें कलियाँ  
चले जो होके बादे-सबा 'आरज़ू' 

कोई और क्या मिसाल दूँ यहाँ
मैं मोहब्बत तो है वफ़ा 'आरज़ू' 

सुकून हर दर में हो जाए अता 
जहाँ भी मैं लूँ गुनगुना 'आरज़ू' 

हिज्र की तनहा सी इन रातों में 
रौशनी का हो रहे दिया 'आरज़ू' 

कुछ और 'राज़' क्या ख्याल करें 
नाम जुबाँ पे जबसे सजा 'आरज़ू' 

मंगलवार, जनवरी 04, 2011

जिंदगी फिर जिंदगी सी रहा करे


गम में भी जो ख़ुशी सी रहा करे 
जिंदगी फिर जिंदगी सी रहा करे 

यूँ तो रात-दिन तेरी याद साथ रहे 
पर दिल को कुछ कमी सी रहा करे 

जब भी मेरी आँखें बरसा करें यहाँ 
तीरगी में भी रौशनी सी रहा करे 

तेरे बगैर आलम सेहरा सा लगे है 
जाने कैसी ये तिश्नगी सी रहा करे 

ख्याल बन कर जेहन में तो उतरे 
पर मिले तो अजनबी सी रहा करे 

छूके जो तेरा आँचल चले वो कभी 
हवा फिर तो ये संदली सी रहा करे 

साजों पे जो तेरा नाम लिख दूँ मैं 
तो खुबसूरत मौशिकी सी रहा करे 

सोमवार, जनवरी 03, 2011

आज-कल तो वो बड़ी ही शान में रहता है


आज-कल तो वो बड़ी ही शान में रहता है 
क्या बात हुयी है किस गुमान में रहता है 

जो चला है मेरे आँगन में पत्थर बरसाने 
अरे खुद भी तो कांच के मकान में रहता है 

हो शाम तो लौटना उसे भी शज़र पे ही है 
दिन भर जो परिंदा आसमान में रहता है 

खुदा की मुझपे तो कभी इनायत ना हुयी 
कौन जाने के वो किस जहान में रहता है 

एक अरसा हुआ है उसका ख्याल भुलाए 
पर वो चेहरा आज भी ध्यान में रहता है 

इतनी मिठास कहीं और नहीं है मिलती 
जो लहजा अपनी उर्दू ज़बान में रहता है 

इबादत लबों से नहीं दिल से निकलती है 
रोज़ा जब भी माह-ए-रमजान में रहता है 

शज़र जो ख़ामोशी से हवा में झुक गए हों 
उनसे लड़ने का ना दम तूफ़ान में रहता है 

कमसुखन हैं "राज़", पर ये बात जान लो 
वज़न तो उसके हर इक बयान में रहता है

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

शब् के साए से निकलना चाहता है


शब् के साए से निकलना चाहता है 
चराग शाम से ही जलना चाहता है 

ख्वाब की तासीर बहुत कम रही है 
अब हकीकत में बदलना चाहता है 

जब तय्य्खुल में जिक्र माजी का हो 
आँख से दरिया पिघलना चाहता है 

वस्ल के लम्हों से रहा था ये गिला 
क्यों वक़्त जल्दी ढलना चाहता है

ऐसा नहीं के मेरी आदत नहीं रहीं 
वो पर मेरे बगैर चलना चाहता है 

गम से महरुमियत यूँ तो नहीं उसे  
पर ''राज़'' यूँ ही बहलना चाहता है