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रविवार, जुलाई 04, 2010

हमे मौसमों सा बदलना नहीं आया


हमे मौसमों सा बदलना नहीं आया 
यूँ ज़माने के साथ चलना नहीं आया 

उसका जी भरा खिलौना नया माँगा 
हम थे के कभी मचलना नहीं आया 

इक बार उसे खुदा दिल से कह दिया 
फिर किसी दर पे टहलना नहीं आया 

उसकी ख़ुशी में बस खुश होते गए थे 
इस उलझन से निकलना नहीं आया

उसने गैरों से कह के गम हलके किये 
हमे अश्कों सा  भी ढलना नहीं आया 

'राज' संग नहीं जो टिक पाते मुकाबिल 
जफा की आँधियों में जलना नहीं आया 

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

अहदे-आशिकी क्या है


उन्हें पता ही नहीं,अहदे-आशिकी क्या है 
क्या चीज दिल है भला, दिल्लगी क्या है 

तोड़कर दिल ये मेरा और हँसना उनका 
बात फिर यारों लगती अब नयी क्या है 

है पुरसुकून सहर और है शाम रौशन सी 
मिरी नजर में मगर कुछ, तीरगी क्या है 

उफक के साए से है उस आफताब तलक 
सहर-ओ-शब् के सिवा ये जिंदगी क्या है 

वो घर मिट्टी के और वो टूटे से खिलौने 
बच्चों की इस से जुदा और ख़ुशी क्या है 

बहुत वहम था मुझे, के उसे मैं भूल गया 
निगाह फिर भी मेरी माह पे लगी क्या है 

दुआ के नाम पे करी कितनी बद्दुआ मैंने 
खबर नहीं के खुदी क्या है बेखुदी क्या है

जाम रखें हैं बहुत,और हैं बाहें साकी की
पर जो मिटती ही नहीं, तशनगी क्या है 

उनकी यादों का तरन्नुम है रख्ते-सफ़र
हमसफ़र पूछेंगे अब ये मौशिकी क्या है 

बातें कुछ दर्द की हैं कुछ अश्कों की बहर 
मेरी ग़ज़लों में यही और ताजगी क्या है 

शजर के जैसे कर निबाह जिंदगी अपनी 
ना सोच "राज" मिला क्या है बदी क्या है

मेरे दिल में हैं कितने गम दोस्तों


मेरे दिल में हैं कितने गम दोस्तों 
अब सुनाये तुम्हे क्या हम दोस्तों 

यूँ तो बरसीं शहर में बरसातें बहुत 
तश्नगी फिर भी हुई ना कम दोस्तों 

हुए बेताब कितने वो चाँद और तारे 
शाम से शब् थी कितनी नम दोस्तों 

वक़्त-ए-रुखसत थमीं ना आँखें मेरी 
बहुत बेबस सा था वो अलम दोस्तों 

उनकी गलियां तो छूटीं पर यादें नहीं 
हुए किस्मत के ये भी सितम दोस्तों 

इश्क की राहों में ना मंजिल मिली 
तन्हा फिरे कदम दर कदम दोस्तों 

उसे टूट कर चाहा या चाह करके टूटे  
उमर भर को रहा फिर भरम दोस्तों 

बुधवार, जून 30, 2010

इक खुबसूरत सी किताब लगती हो


इक खुबसूरत सी किताब लगती हो 
चमन का महकता गुलाब लगती हो 

सोचता हूँ क्या नाम दूँ मैं अब तुमको 
चलो कहता हूँ के, माहताब लगती हो 

कभी ख़ुशी हो तो होठों पे खिलती हो 
गम में जो बरसे वो सैलाब लगती हो 

शाम जुल्फों के रंगीन साए में पाले 
सहर का खुशनुमा आदाब लगती हो

और वो इबादत में यूँ हाथ उठाने नहीं 
काफिरों को खुदा का जवाब लगती हो 

रविवार, जून 27, 2010

फिर वो मौसम सुहाने याद आये


यूँ ही थे साथ जो गुजरे ज़माने याद आये 
हमको फिर वो मौसम सुहाने याद आये 

जख्मो की जब सौगात हुई नसीब अपने 
तुम्हारे हाथों के मरहम पुराने याद आये 

मेरा इंतजार और उसपे तुम्हारा ना आना 
बारिश तो कभी शाम के बहाने याद आये 

जफा-ओ-वफ़ा की मैं और मिसाल क्या दूँ 
कुछ शम्में याद आयीं,  परवाने याद आये 

दवा से इलाजे-दर्दे-दिल हुआ न मुक्क़मल
साकी की आँखों से मिले पैमाने याद आये 

तेरे बगैर जिन्दगी की तो तहरीर ना बनी 
याद आये तो तन्हा से अफ़साने याद आये 

"राज" क्या बिसात भला इश्क में है तेरी 
सोचा तो मजनूँ से कई दीवाने याद आये 

शनिवार, जून 26, 2010

लहजे में खुद्दारी रख


दूर सब दुनियादारी रख 
बस लहजे में खुद्दारी रख 

आसमान से डरना क्या 
बस उड़ने की तैयारी रख 

जिसकी आँखों से पी ले तू 
फिर उससे ना गद्दारी रख 

गमे हिज्र को मान के नेमत 
फुरकत में जीना जारी रख 

जफा मिले तो वफ़ा निभा 
सोच ये अपनी भारी रख 

सफे-दोस्तां साथ ना दे तो 
अदू से ही दिलदारी रख 

जो प्रीत की तुझसे रीत निभाए 
उन पांवों में जन्नत सारी रख 

हद-ए-दर्द जब बढ़ जाए "राज" 
तैयार ग़ज़ल इक प्यारी रख 

******************
सफे-दोस्तां----मित्र मंडली,

अदू----दुश्मन 

गुरुवार, जून 24, 2010

हमे भी देखकर मुस्कराया करो


हमे भी देखकर मुस्कराया करो 
मिलने हमारे घर भी आया करो 

सबकी नजरें सही नहीं लगती 
यहाँ वहां मत आया जाया करो 

सफ़र तय करते उम्र बीतती है 
दूर कहीं मंजिले ना बनाया करो 

लोग पागल ही समझेंगे तुम्हे 
मुझे सोच के ना शरमाया करो 

अब सबसे दुश्मनी क्या करना 
दिल नहीं हाथ तो मिलाया करो 

अँधेरे घर में अच्छे नहीं होते हैं 
शाम हो तो चराग जलाया करो 

काफ़िरो के हक दुआ नहीं होती 
उनके लिए भी हाथ उठाया करो

बुधवार, जून 23, 2010

शब् के जख्मों को कुछ सहलाना चाहिए


शब् के जख्मों को कुछ सहलाना चाहिए 
जो शाम बिखरे तो चराग जलाना चाहिए 

नाम इश्क की जमात में लिखवा दिया है 
फिर मौसमे-दर्द में भी मुस्कराना चाहिए 

थक जाओ कभी जब हवा नापते-नापते 
अपने घर तुम्हे फिर लौट जाना चाहिए 

और खुदा--खुदा कहने से कुछ नहीं होता 
सच्ची इबादत हो तो सर झुकाना चाहिए 

छोड़ दो ये नफे-नुकसान की बातें करना 
इस दिल को तो यूँ ही आजमाना चाहिए

सोचती होगी वो कासिद को फिर देखके 
इस बार ख़त उनका जरुर आना चाहिए 

चाँद तारों तक तो अपनी पहुँच नहीं होती 
उनकी ही गली का चक्कर लगाना चाहिए 

जो तुम्हारी जफा के बदले वफ़ा किया करे 
"राज"उनको पलकों पे ही बिठाना चाहिए

शाम तन्हा सहर तन्हा


शाम तन्हा सहर तन्हा
ख्वाबों का सफ़र तन्हा

शाखों पे पत्ते पीले पीले 
गुल तन्हा शजर तन्हा

सलामो दुआ होती नहीं 
कैसा सारा शहर तन्हा

जाऊं रखूं उम्मीद क्या 
मिलेगा जब घर तन्हा 

परिंदे अब किसे दें सदा
रिहाई ढूंढे नजर तन्हा

रविवार, जून 20, 2010

खूबसूरत ग़ज़ल हो जाए....


तुम्हारी याद का गर एक भी पल हो जाए 
समझो फिर तो खूबसूरत ग़ज़ल हो जाए 

जो इश्क का सामान अपने घर रखता हो 
सौदा बेवफाई का हो तो वो पागल हो जाए 

तुम भी खामोश और हम भी रहे चुप जो 
फिर कहो कैसे कोई मसला हल हो जाए 

बहुत हुए जीने को मुझे कुछ लम्हे पुराने 
सोचता हूँ के क्यूँ कोई रद्दो-बदल हो जाए 

माना के हूँ काफिर पर डरता भी बहुत हूँ 
मुलाकात ना खुदा से रोजे-अजल हो जाए