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बुधवार, मार्च 10, 2010

हम भी दीवाने लगते हैं....



 उसके कंगन उसकी चूड़ी जब दिल को भाने लगते हैं 
वो भी दीवाने हो जाते हैं और हम भी दीवाने लगते हैं 

रात--रात भर जाग के यारों वो रस्ता मेरा तकती है 
उस भोली सी पगली को फिर ख्वाब सताने लगते हैं 

बदली की इस ओट में जब ये चाँद सुहाना खिलता है 
मेरे घर की छत पर से फिर सब पंछी जाने लगते हैं 

बहते बहते वो दरिया जब आकर मुझसे टकराता है 
उसकी तेज रवानी पे भी कुछ साहिल आने लगते हैं 

काफिर नाम हमारा तुमने जाने कब-क्यूँ दे डाला है 
मस्जिद में गर हो अजान, हम भी दोहराने लगते हैं 

करके वादा आते आते जब वो घर अपने रुक जाते हैं 
बारिश का करते हैं बहाना, कुछ कसमे खाने लगते हैं 

उसकी सूरत पे तब हमको यूँ प्यार बहुत आ जाता है 
जब अपनी प्यारी आँखों से वो अश्क बहाने लगते हैं  

शाख से बिछड़ा इक पत्ता जब आंधी से टक्कर लेता है 
हम टूटे सब रिश्तों को फिर चुपके से सजाने लगते हैं 

उसके घर से मेरी गली को, बादे-सबा जब चलती है 
अपने दिल का 'राज' यूँ सारा उसको सुनाने लगते हैं

किसी के लिए इतना तो कर जाएँ


किसी के लिए इतना तो कर जाएँ 
दामन में दुआओं का रंग भर जाएँ 

जब वक़्त के सफ़र में शाम हो कहीं 
चलो यारों यहीं पे हम भी ठहर जाएँ 

माकूल अपने हर ज़वाब तुम रखना 
सवाल करने वाले कहीं ना डर जाएँ 

शोहरत इस ज़माने में गुल सी हो यूँ 
के बनके इक खुशबू बस बिखर जाएँ 

दुआ दो सेहरा में के मौसमे गुल हो 
जहाँ तक हो नजर मंजर सवंर जाएँ 

मेरी गजलों में अब कुछ नहीं बाकी 
चलो तुम भी जाओ हम भी घर जाएँ

बुधवार, मार्च 03, 2010

इश्क जात नहीं देखता .....


मजहब नहीं देखता इश्क जात नहीं देखता 
ये रंग नहीं देखता और औकात नहीं देखता 

जब होना होता है किसी को तब हो जाता है 
दिन नहीं देखता कभी, ये रात नहीं देखता 

क्या खोया क्या गंवाया किसने क्या फिकर 
कोई शह नहीं देखता, कोई मात नहीं देखता 

दीद महबूब की ख्वाबों में किया करता है 
बेतकल्लुफ सी कोई मुलाकात नहीं देखता 

नहीं पड़ता है, फर्क इसे, कौन हैं क्या है तू 
तू "तू" हैं सिवा इसके कोई बात नहीं देखता 

सोमवार, मार्च 01, 2010

वो जख्म, वो दर्द, वो वीरानियाँ रहती हैं


वो जख्म, वो दर्द, वो वीरानियाँ रहती हैं 
आज भी घर मेरे ये निशानियाँ रहती हैं 

मौसमों के झोंके सा यहाँ वहां फिरता है 
जाने कैसी दिल में परेशानियाँ रहती हैं 

मेरा हर ख्वाब सहर से पहले टूटता है 
कहाँ पे खुदा की निगेहबानियाँ रहती हैं 

मेरे अजीज पीठ पे वार किया करते हैं 
उनकी ऐसी कुछ मेहरबानियाँ रहती हैं 

किसी की जफा को जब वफ़ा कहता हूँ 
चेहरे पे तब उनके पशेमानियाँ रहती हैं 

नहीं तोहमत मैं उस मासूम पे लगाता
याद बस कुछ मुझे नादानियाँ रहती हैं

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

अब तो हर घड़ी बस उसके ख़याल आते हैं




अब तो हर घड़ी बस उसके ख़याल आते हैं 
दर्द उसे हो तो आँखों में मेरी शलाल आते हैं 

वो याद कर-2 के मेरी हिचकियाँ बढाता है 
करने कुछ उसको, ऐसे भी कमाल आते हैं 

जबसे अक्स उसका इस दिल में उतर गया 
कहाँ पसंद अब हमे हूरों के जमाल आते हैं 

शब् भर ख्वाबों में वो दीदार क्या देने लगा 
इब्तिदा-ऐ-सहर दो घड़ी और टाल आते हैं 

और करके वादा ना आना होगी अदा उसकी 
हम तो इंतजार में कई शामें निकाल आते हैं 

बज्म-ऐ-हुस्न में यूँ तो चेहरे बहुत मिलते हैं 
इन आँखों को नजर वो ही फिलहाल आते हैं 

उसके आने की खबर से पलकें नहीं झपकती 
जाने कैसे कैसे 'राज' खुद को संभाल आते हैं

मंगलवार, फ़रवरी 23, 2010

तेरे बगैर भी जिंदगी चलने लगी है


रात आ गयी ये शाम ढलने लगी है 
तेरे बगैर भी जिंदगी चलने लगी है 

जब से अश्के--बज्म सजाई है मैंने 
तन्हाई भी घर से निकलने लगी है 

तेरी यादों के साए ही काफी हैं यहाँ 
उनसे ही शाम अब बहलने लगी है 

लौट के ना देखना अब मेरी जानिब  
तबियत जरा जरा संभलने लगी है 

वो और वक़्त था के तेरी दरकार थी 
मेरी आदत भी अब बदलने लगी है 

ऐसी तीरगी नहीं जो मिट ना सके 
आँख भी चराग सी जलने लगी है 

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

भला क्यूँ शराफत कम हो गयी है




क्या मेरी मोहब्बत कम हो गयी है 
या फिर कुछ शिद्दत कम हो गयी है 

खुदा तो अब भी वही रह गया यहाँ 
क्यूँ मगर इबादत कम हो गयी है 

पहले तो रोज मिला करते थे हम 
कभी-2 की आदत कम हो गयी है 

रस्मे निभाने के बहाने हैं तुम्हारे 
सच में क्या फुर्सत कम हो गयी है 

लुत्फ़ था बेवजह झगड़ने में भी 
क्यूँ वो शिकायत कम हो गयी है 

पशेमानी उनकी अच्छी नहीं है 
लगे जैसे अदावत कम हो गयी है 

अब तो लबों पे बद्दुआ नहीं लाते 
भला क्यूँ शराफत कम हो गयी है

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

अब दिल मेरा क्यूँ ये पत्थर नहीं होता



अब दिल मेरा क्यूँ ये पत्थर नहीं होता 
मर्ज-ऐ-मुहब्बत का चारागर नहीं होता 

छोड़ देते हैं जो किसी के वास्ते दुनिया
उनके लिए फिर जहाँ में घर नहीं होता 

दिल लगाना तोड़ देना खेल हैं उनका
हममें ऐसा कोई क्यूँ हुनर नहीं होता 

नहीं सीखा है जिसने झुकना ज़माने में 
उस शाख-ऐ-शजर पे समर नहीं होता 

जो ना बहे किसी के दर्द में,अहसास में 
वो अश्क है पानी कभी गुहर नहीं होता 

वो मेरी हर आह को समझ गया होता 
रकीब का सिखाया कुछ गर नहीं होता 

नसीब अपने भी कब के सवंर गए होते 
जुल्फ में उलझा, जो मुकद्दर नहीं होता 

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

इन तन्हा आँखों में इक इन्तजार रहता है



इन तन्हा आँखों में इक इन्तजार रहता है
उसके लिए दिल अब भी बेक़रार रहता है 

और हर आहट पे झरोखे तक आ जाती हूँ 
वो आएगा ये गुमाँ मुझे बार-बार रहता है 

यूँ तो सबसे हंस बोल लिया करती हूँ मैं 
दिल में मगर जाने कैसा आजार रहता है 

तन्हाईयाँ यूँ मेरी अब चुभती तो बहुत हैं 
पर उम्मीदों का कायम गुलजार रहता है 

"राज" दिखने में संग पर मासूम भी तो है 
क्यूँ कहते हो उसमे के गुनहगार रहता है 

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

राहें तो मिल गयीं मगर, रहबर नहीं मिला



राहें तो मिल गयीं मगर, रहबर नहीं मिला 
ईंटों से बना मकाँ पर कभी घर नहीं मिला 

मेरे लबों की मुस्कान से ये गुमाँ बना रहा 
आँखों में मेरी किसी को सागर नहीं मिला

सहरा सहरा जाने क्यूँ भटका किये थे हम 
जिसकी तलाश थी वो उम्र भर नहीं मिला 

जाने कैसी आहट कानों में आती-जाती रही 
चौखट पे जो देखा तो कोई बाहर नहीं मिला 

अश्कों से जाने कैसी अपनी कुर्बत हो गयी 
खुशियों का फिर कभी भी मंजर नहीं मिला