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सोमवार, जुलाई 06, 2009

जो दर्द दे उसको भुला देना अच्छा




जो दर्द दे उसको भुला देना अच्छा
ज़ख्म हो जाए तो दवा देना अच्छा

और गर यादें नासूर बन जाएँ कभी
उनको दिल से ही मिटा देना अच्छा

तनहा रहके हासिल कुछ नहीं होता
शानो पे रखके सर बता देना अच्छा

जो थाम ले तेरे आरिज पे ढलके अश्क
हर वादा उस से ही निभा देना अच्छा

ये बहारें तेरे जानिब आने को बेताब हैं
अब तो घर के परदे उठा देना अच्छा

मुस्कराने का तुमको भी तो हक है'राज'
हंसी को अब लबों का पता देना अच्छा

मंगलवार, जून 30, 2009

अपनी इन ग़ज़लों में, उसकी जवानी रखता हूँ




उसके खूबसूरत अहसासों की कहानी रखता हूँ
अपनी इन ग़ज़लों में, उसकी जवानी रखता हूँ

आसमाँ सी चाहत तो है मुझे दूर तक जाने की
पर अपने क़दमों पे जमीं की निशानी रखता हूँ

और कुछ नहीं कहता आज भी मैं उनके सामने
अपने बुजुर्गों के लिए आँख में पानी रखता हूँ

दुश्मनों को दोस्तों से कभी कम नहीं आंकता
उनके लिए यह सोच अपनी सयानी रखता हूँ

कौन आएगा लेने टक्कर मुझसे मेरी जानिब
एक हाथ में कजा एक में जिंदगानी रखता हूँ

इश्क में बेवफाई करती रहे ये हक है उसको
वफादारी में खुद सा ना कोई सानी रखता हूँ

लाख सितम करे कोई पर उफ़ भी नहीं करता
अपने चेहरे की इबारत बस बेजबानी रखता हूँ

मेरे अहबाब मांग ले तू, मेरी जान किसी रोज
देख मैं क्या क्या जज्ब -ऐ -कुर्बानी रखता हूँ

पीता हूँ, बहकता हूँ, ये इनकार नहीं मुझको
घर की दरो दीवार मगर पहचानी रखता हूँ

तुम मेरी ग़ज़लों पे कभी भी दाद दो या न दो
अपने दिल में इज्जत तुमको पुरानी रखता हूँ

मुझे देखके मेरे अपने भी गमजदा न हो जाये
दिल में छुपा के 'राज' ग़मों की वीरानी रखता हूँ

रविवार, जून 21, 2009

सिवा इनके अंदाज शायराना नहीं आता




मैं इश्क करता हूँ पर जताना नहीं आता
दिल में रखता हूँ राज बताना नहीं आता

आँखों में हिज्र का सावन छुपा है कब से
रुत बदलती है मगर बरसाना नहीं आता

खता उसकी भी हो तो खामोश रहता हूँ
गिले शिकवे मासूम पे लगाना नहीं आता

उसको गुलाब कहता हूँ या चाँद कहता हूँ
सिवा इनके अंदाज शायराना नहीं आता

उसके दर पे सहर नहीं पहुँचती जब तक
अपने आँगन का चराग बुझाना नहीं आता

शनिवार, जून 13, 2009

इश्क में दिल हारने वाला



जागती आँखों में उसकी ख्वाब हुआ जाता है
इश्क में दिल हारने वाला कामयाब हुआ जाता है

अहमियत न दो तो ये एक कतरा भर ही है
समझो गर तो अश्क भी सैलाब हुआ जाता है

कैसी है आरजू ये, मेरी कैसी है ये तमन्ना
वो रूबरू भी रहे और दिल बेताब हुआ जाता है

गम हो गर उसे तो अपना सा लगता है वो भी
उसके चेहरे का तबस्सुम नायाब हुआ जाता है

कभी निकल जाती है वो जब बेनकाब बाम पे यूँ
हया में छुपती नाजनीन सा माहताब हुआ जाता है

रविवार, जून 07, 2009

मुझे मनाना नहीं आता....



तुम रूठ जाती हो तो मुझे मनाना नहीं आता
झूठ का खूबसूरत आईना दिखाना नहीं आता...

सच कहता हूँ तो तुम्हारी आँखे नम देखता हूँ
क्या सूरत करूँ मैं, तुमको बहलाना नहीं आता...

इक पागल हूँ, शायद लोग सच ही कहते हैं
गुनाह करता हूँ और मुकर जाना नहीं आता...

तुम हंस दो यही तमन्ना लिए फिरता हूँ
सिवा तुम्हारे मुझे मुस्कराना नहीं आता...

मेरे अल्फाजो को थोडी अहमियत तो दे दो
किसी और ढंग से मुझे जतलाना नहीं आता...

मंगलवार, जून 02, 2009

करी कोशिश कभी...



करी कोशिश कभी लब पे जो तेरे गीत गाने की 
दर्द उभर आया फिर से जुबाँ पे इस दीवाने की ... 

जज्बात -ए - गम मैं छुपा के कैसे रख लू यारो 
नहीं बख्शी खुदा ने नेमत मुझे मुस्कराने की ...

तेरी गलियों से उठ आये तो यही दर मिला मुझको 
बात मस्जिद की नहीं काफिर बात है मयखाने की ...

अब दवा की सूरत में बस ये दर्द मिला करता है 
दिल को रास आने लगी हैं राहें उस गमखाने की ...

उसकी खूबसूरती यूँ ही नहीं हुआ करती है "राज" 
शमा ढलती नहीं जब तक खाख में परवाने की .

शुक्रवार, मई 29, 2009

मैं सहर हूँ




उसकी खुशबू से तरबतर हूँ
एक महकता हुआ शजर हूँ

उसके आरिज पे खिलता हूँ
नम-शबनम सा रात भर हूँ

सारे रिश्तों को पहचानता हूँ
मैं मोहब्बत से आबाद घर हूँ

हालात कुछ भी हो जीता हूँ
रखता फौलाद का जिगर हूँ

एक रोज वो पढ़ेगी देखना
सुनी सुनाई ताजा खबर हूँ

वो शब् मुझसे अब डरती है
मिटा दूंगा उसको मैं सहर हूँ.

बुधवार, मई 27, 2009

जिद कर लेती




काश तुझे अपना बनाने की जिद कर लेती
मैं फिर से यूँ मुस्कराने की जिद कर लेती

तुझे एहसास हो गया होता मेरे जज्ब पे
अपनी खाख से तुझे महकाने की जिद कर लेती

तोड़ देती सारे जहाँ की रस्मे तेरी खातिर
सरे-आम सीने से लगाने की जिद कर लेती

मेरी शिद्दत का ये भी इम्तिहान होता गर
क़यामत तक वादा निभाने की जिद कर लेती

रविवार, मई 10, 2009

तेरा इन्तजार शब् भर रहा



तेरा इन्तजार शब् भर रहा
तू ना जाने कहाँ उलझा रहा

मैं उसी मोड़ पे बैठी रही
तेरी राहों से जो मुड़ता रहा

यूँ तो मैंने खुद को संभाला बहुत
पर आँचल हवा से उड़ता रहा

सहर की जब से आहट हुई
अश्कों से नाता मेरा जुड़ता रहा

रविवार, मई 03, 2009

मेरे दिल की जिद .....




वो मुझसे जख्म खाने की जिद करता है 
फिर भी हर हाल मुस्कराने की जिद करता है 

लेता है कुछ यूँ मेरे हौसलों का इम्तेहान 
के हर चोट पे नमक लगाने की जिद करता है 

ख्वाहिश खिजाओ से रखता है कुछ यूँ 
तनहा शजर पे गुल खिलाने की जिद करता है 

जब के जानता है वो संग है न पिघलेगा 
फिर भी इक बार और आजमाने की जिद करता है 

गर कभी ख्वाब में वो आ जाए भूल से 
नींद को आँख से न जाने की जिद करता है 

संभल के चलते हैं जब मयकदों से भी 
न जाने क्यूँ "राज" लड़खडाने की जिद करता है