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शनिवार, दिसंबर 01, 2012

खिड़कियाँ खोलो के अन्दर रौशनी आये




खिड़कियाँ खोलो के अन्दर रौशनी आये 
वीरान घर में फिर से कुछ जिंदगी आये 

ख्वाब आँखों के आवारा हुये जाते हैं देखो  
शब् से कहो के उनको थोड़ा डांटती आये 

खुशबू-ए-अहसास जो लफ़्ज़ों में ढले तो    
सफहों पे महकती हुई फिर शायरी आये 

मकसद वजूद का यूँ हो जाये मुक़म्मल 
काम आदमी के जब कभी आदमी आये 

यूँ तो खुदा से कोई दुश्मनी नहीं हैं मगर 
रास हमे खुदाई से ज्यादा काफिरी आये 

सहरा के सुलगते दिल ये ही सोचते होंगे 
कभी दरिया के हक में भी तश्नगी आये 

"राज़" कुछ नहीं आरज़ू इक सिवा इसके 
के उसकी बांहों में ही सांस आखिरी आये 

शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे




लफ़्ज़ों की दहशत अजब काम ना कर दे 
ये कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे

बात कडवी मगर सच ही तो रहती हमेशा 
चुप बैठा हूँ, कहीं क़त्ल-ए आम ना कर दे
 
सन्नाटे में गुजर इक हद तक ही है वाजिब 
हद जरा भी बढ़े तो जीना हराम ना कर दे

लत शराब औ' शबाब की अच्छी नहीं होती 
कहीं ये घर बार तक तेरा नीलाम ना कर दे 

जो सियासी लोग हैं उनसे जरा बच के रहिये 
इनसे दोस्ती कहीं आपको बदनाम ना कर दे 

गुरुवार, नवंबर 29, 2012

तिरी याद का दिसंबर.....




वही तन्हाई, वही ख़ामोशी, वही बियाबान मंजर 
लौट के आ गया है फिर से तिरी याद का दिसंबर 
जल उठे हैं वही पुराने कुछ अरमान दिल के अंदर 
लौट के आ गया है फिर से तिरी याद का दिसंबर

कुछ सुलगती हुयी साँसे तो कुछ तरसती निगाहें 
और पतझड़ की रुत में जैसे सब वीरान हुयी राहें 
आहों के जलते शोले और उसपे आँखों का समंदर 
लौट के आ गया है फिर से तिरी याद का दिसंबर

मौसमों की बर्फ़बारी और रातों की लंबी बेक़रारी 
एक एक लम्हा भी सदियों पे हो रहा हो जैसे भारी 
शायद ये पूछने के रहता हूँ कैसे तुझसे बिछड़कर 
लौट के आ गया है फिर से तिरी याद का दिसंबर

कानों को मेरे छूकर के जब भी ये गुजरेंगी हवाएं 
नाम तेरा मुझको ही हर दफे बस जायेंगी बताएं 
हिचकियों में ही होगी अब तो यहाँ अपनी गुजर 
लौट के आ गया है फिर से तिरी याद का दिसंबर

सोमवार, नवंबर 12, 2012

समझो मेरे हालात ये अशआर देखकर



यूँ ही ना जानो इन्हें तुम बेकार देखकर 
समझो मेरे हालात ये अशआर देखकर 

उसके चेहरे पे रुकी हैं कब से मेरी नज़रें   
जलता हूँ अपनी ताकते दीदार देखकर 

मुहब्बत के फिर पढने लगता हूँ कशीदे 
आऊं अल्हड़ सा जब मैं किरदार देखकर  

देखो तो ये बावरा सा इधर उधर फिरे है 
चाँद भी आया है उसका रुखसार देखकर 

फिर वो ही बासी-पुरानी ख़बरें मिलेंगी 
क्या करना है छोड़िये अख़बार देखकर.

अपने वोट की कीमत पहचान बसर तू 
अबके संसद में भेजना सरकार देखकर

कैसे तुम्हे ''राज़'' अपनी ग़ज़ल सुना दें 
तुम दाद भी देते हो तो फनकार देखकर 

शुक्रवार, नवंबर 09, 2012

ज़ख्मों का ये दरख़्त तब हरा होगा...



ज़ख्मों का ये दरख़्त तब हरा होगा 
इन आँखों में जब सावन भरा होगा 

झूठ है के हिमालय से वो गंगा लाये 
ये ऐसा काम हम जैसे ने करा होगा 

मेक'अप नहीं चेहरे की शिकन देखो 
कैसे दिल पे उसने पत्थर धरा होगा 

गाँव की हवाओं में फिर से मातम है 
किसी घर में कोई किसान मरा होगा 

शक की उसपे ना बुनियाद हो "राज़" 
दिल से जो होगा वो रिश्ता खरा होगा 

शुक्रवार, अक्टूबर 12, 2012

ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को...




जब होंगे लोगों के दिल में वलवले मचलने को 
आ जायेंगे वो भी इन्कलाब के रस्ते चलने को 

ऐ सियासतदानों जरा तुम मुड़ कर के तो देखो 
ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को 

बरसों बरस से तुमने तो यहाँ बहुत धूप है सेंकी  
बढ़ रहा है अब मगर दिल्ली का सूरज ढलने को 

लेकर आयेंगे कुछ चराग हम इस नयी सदी से  
जो तैयार होंगे तूफ़ान के साए में भी जलने को 

आ गया है कुछ नया सुरूर अबके तो हवाओं में
तभी तो हर शख्स बेताब है घर से निकलने को

किसी पत्ते ने भी उससे तो रफाकात ना निभायी
शज़र छोड़ आये वो तन्हा पतझर में उबलने को 

यादों की बर्फ पे "राज़" करी है लफ़्ज़ों की गर्मी
 दो चार ग़ज़लें तो है बस अब यूँ ही पिघलने को   

शनिवार, सितंबर 29, 2012

उसकी यादों में आये इतवार तो अच्छा हो....



दर्द का रुक जाए ये कारोबार तो अच्छा हो 
उसकी यादों में आये इतवार तो अच्छा हो

फिर वो मेरे गम, मेरी वहशत को समझेगी
उसे भी गर होये ये मुआ प्यार तो अच्छा हो 

जितने भी हैं गिले शिकवे उन्हें बचाए रखिये
मोहब्बत में रहे जो कुछ उधार तो अच्छा हो 

जिसकी आमद से रौशन ये चराग होने लगें 
घर आये वो शाम अब के बार तो अच्छा हो 

ये खिज़ा का मौसम कब तलक रहे यूँ जवाँ
इन गलियों से भी गुजरे बहार तो अच्छा हो 

उखड़ती हुयी हर सांस बस ये सोचती होगी 
के मर ही जाये अब ये बीमार तो अच्छा हो 

कासे में कुछ ना डालो मगर वो दुआयें देता है
फकीर जैसा हो अपना रोजगार तो अच्छा हो 

कुछ भले बदले ना बदले इस मुल्क में मगर 
बदल जाये दिल्ली की सरकार तो अच्छा हो

अजीब शख्स हो "राज़" जो गम में हँसते हो 
तुम जैसा हो गर कोई फनकार तो अच्छा हो 

शनिवार, सितंबर 22, 2012

चोट पानी जब करता है तो पत्थर टूट जाते हैं



हौसला जज्ब में रखिये तो सब डर टूट जाते हैं 
चोट पानी जब करता है, तो पत्थर टूट जाते हैं

ये किस्मत में खुदा ने क्या है लिख दिया अपनी 
नज़र जिनपे है जा टिकती वो मंजर टूट जाते हैं 

बात इन्सान की हो या, हो फिर इन दरख्तों की 
जिन्हें झुकना नहीं आता वो अक्सर टूट जाते हैं 

बरक़त दूर से ही ऐसों को छू कर के गुजरती है 
बिना माँ के जो होते हैं,  वो सब घर टूट जाते हैं 

मुहब्बत की बीमारी ने जिन्हें आकर के है घेरा 
ठीक बाहर से दिखते हैं पर वो अंदर टूट जाते हैं 

किसे है वक़्त के मंदिर-मस्जिद की जरा सोचे 
कमाने भर में ही सब के काँधे-सर टूट जाते हैं 

''राज'' पलकों में अपनी आप, ख्वाब ना रखिये 
सहर जब आँख मलती है ये गिरकर टूट जाते हैं 

गुरुवार, सितंबर 20, 2012

कोई अशआर नहीं हूँ.....


इश्क में मर जाऊं, इतना बीमार नहीं हूँ 
चाहता हूँ तुझे पर तेरा तलबगार नहीं हूँ 

यूँ तो मुश्किल नहीं है, समझना मुझको 
पर हर कोई पढ़ ले मुझे अख़बार नहीं हूँ 

मैं चंद लफ़्ज़ों में सिमट जाऊं मगर कैसे 
इक लंबी दास्ताँ हूँ कोई अशआर नहीं हूँ 

मेरे सच से गर आप खफा हैं तो हो जाएँ    
चापलूसी के फन का मैं, फनकार नहीं हूँ 

अपने लफ़्ज़ों में हूँ आफताब समेटे हुए 
तुम्हारे जैसा जुगनू का किरदार नहीं हूँ 

रंज है मुल्क के सियासतदानों से मगर 
असीम हो जाऊं मैं, इतना गद्दार नहीं हूँ *

जानता हूँ के, ये लहजा नहीं पसंद तुम्हे
तुम्हे समझाऊं, इतना समझदार नहीं हूँ 

मेरी इबादतों का सिला नहीं देता है खुदा 
क्यूँ मैं अपनी आरज़ू का हकदार नहीं हूँ 

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* 'असीम'....एक कार्टूनिस्ट....
 जिसने भारत के संविधान एवं संसद की गरिमा
भंग करते हुए कुछ कार्टून बनाये, जिसके फलस्वरूप 
उसको कुछ दिनों की जेल की सजा हुयी... 

गुरुवार, सितंबर 06, 2012

जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद



जलते चराग सारे बुझा आयी है शायद 
जो शब् होकर के खफा आयी है शायद
 
लो, अब खामोश तहरीर हो गयी है वो 
हाँ, ख़त मेरे सब जला आयी है शायद 

के अब रात-रात भर यादों में जागते हैं 
काम कुछ तो मेरी दुआ आयी है शायद 

सच कह कह के सबसे उलझते रहना 
मेरे हक में ये ही सज़ा आयी है शायद 

महक उठे हैं खुशबू से हजारों आलम
उसके गेसू छू के हवा आयी है शायद 

होगी आरज़ू भी मुक्क़मल ''राज़'' की 
खुदा की अब तो रज़ा आयी है शायद