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रविवार, जून 10, 2012



सुबह से चल निकले हैं, शाम तक पहुँच ही जायेंगे 
ये चाँद सितारे अपने मक़ाम तक पहुँच ही जायेंगे 

आप बस लफ़्ज़ों के जुगाली यूँ ही करते रहिएगा 
दो-चार अशआर तो अंजाम तक पहुँच ही जायेंगे 

अभी तो बज़्म में पहली ही मुलाक़ात हुयी है उनसे 
फिर से मिले तो दुआ-सलाम तक पहुँच ही जायेंगे 

ये इश्क के किस्से हैं, बदनाम कर देंगे हम दोनों को 
उसके नाम से चले हैं मेरे नाम तक पहुँच ही जायेंगे 




जब कभी भी हौसला तीरगी करने लगे 
लौ चरागों पे धर हम रौशनी करने लगे 

इसकी फितरत पर क्या भरोसा कीजिये 
जाने कब क्या फिर ये आदमी करने लगे 

हो गयी थी काबिज़ फलक पे शाम जब 
सब दरख्तों के परिंदे वापसी करने लगे 

बाद मुद्दत के घर को लौट आया कोई जब 
घर के दीवार-ओ-दर मौशिकी करने लगे 

ख़त मेरे यूँ ही फिर पढ़ लिया करना तुम 
जब परेशां तुम्हे तन्हाई-बेबसी करने लगे 

ज़मात-ए-इश्क में नाम अपना क्या लिखा 
हुज़ूर उस रोज़ से हम भी शायरी करने लगे 

औलिया की दरगाह पे जो क़दम अपने पड़े 
क्या गजब के काफिर भी बंदगी करने लगे 

मंगलवार, मई 08, 2012

कट रही है ये जिन्दगी जिन्दगी की तलाश में



कभी गम की तलाश में 
कभी ख़ुशी की तलाश में 
कट रही है ये जिन्दगी
जिन्दगी की तलाश में 

मैंने पूछा, के "ऐ हवा  
तू भटकती है यूँ क्यूँ .."
जवाब आया के "रहती हूँ 
मैं किसी की तलाश में " 

ना बहर सीखी कभी ना 
वज़न नापा लफ़्ज़ों का
बस सफहे ही रंगे हमने 
शायरी की तलाश में  

हमने तो इश्क में उसको 
खुदा का दर्जा है दे दिया 
आप सर मारिये पत्थर पे   
हाँ, बंदगी की तलाश में 

रविवार, अप्रैल 29, 2012

जब लफ्जों में उसका चर्चा हुआ होगा



इक और अशआर अच्छा हुआ होगा 
जब लफ्जों में उसका चर्चा हुआ होगा 

दिल के कोने से कुछ आहटें आती हैं 
कोई शायद यहाँ पे ठहरा हुआ होगा 

आजकल जी-आप से बात करता है 
मोहब्बत का नया लहजा हुआ होगा 

उसके आने की जब खबर आयी होगी 
आँखों में फिर दरिया उतरा हुआ होगा 

बरसों बाद आज फिर घर को लौटा हूँ 
सोचता हूँ के क्या-२ बदला हुआ होगा 

सफहों पे "राज़" दिल के बयां हुए होंगे 
इक-२ हर्फ़ आरज़ू का चेहरा हुआ होगा 

उनके लिए तो होठों से बस दुआ निकले



क्या हुआ जो के वो हमसे बेवफा निकले 
उनके लिए तो होठों से बस दुआ निकले 

उसका जिक्र हो तो बे-जुबाँ भी बोल पड़े 
काफिरों के लब से भी खुदा खुदा निकले 

चलो आओ हम भी नयी मोहब्बत लिखें 
नए ज़माने में नया सा फलसफा निकले 

कोई बे-वजह इसे बदनाम ना कर सके 
हो काश यूँ के मय भी कभी दवा निकले 

सहर आये मुस्कराती बागों में फलक से 
तब जाके गुंचों की शर्म-ओ-हया निकले 

गयी रुतों के फिर सारे पैरहन उतार कर 
देखो अबके शजर बहुत खुशनुमा निकले

पलकों पे फिर आंसुओं के सितारे जवाँ हों
जब याद उसकी दिल से होके सबा निकले

सदियाँ गुजर गयीं बस ये सोचते--सोचते   
के किसी रोज तो वो मेरी गली आ निकले 

के चाहो तो चीर दो तुम तहरीर "राज़" की 
लफ़्ज़ों में कुछ ना आरज़ू के सिवा निकले 

शुक्रवार, अप्रैल 13, 2012

लफ़्ज़ों में हमने दर्द को बोया हुआ है


बड़ी मुश्किलों से आज सोया हुआ है 
ये दर्द मेरा कितनी रातें रोया हुआ है 

उसकी चाहत बस चाहत ही रह गयी 
ख्वाब में पाया, सच में खोया हुआ है 

निखर के आ गया है चेहरा सहर का 
शब् ने आंसुओं से इसे धोया हुआ है 

देखो के महकती हुई ग़ज़ल आ गयी 
लफ़्ज़ों में हमने दर्द को बोया हुआ है 


मंगलवार, अप्रैल 03, 2012

पत्थर हम छू भर लें तो वो पिघलने लगते हैं



मौसमों की तरह वो भी रंग बदलने लगते हैं 
बुरे वक़्त दोस्त भी बचके निकलने लगते हैं 

जिन्हें मजहब का अलिफ़-बे भी नहीं पता  
बात मजहबी चले तो खूब उबलने लगते हैं 

आग दंगों की भला किसी को छोडती है कभी 
हिंदू हो या मुस्लिम घर सबके जलने लगते हैं  

वो लोग और होंगे जो पीकर लड़खडाते होंगे 
हम वो हैं जो पीकर के और संभलने लगते हैं 

ग़ज़ल में जिक्र जो उसका जरा सा हम कर दें 
ये चाँद सितारे फिर क्यूँ भला जलने लगते हैं 

जो सच बात तो वो कड़वी ही लगनी है तुमको 
क्या करें हम जो लफ्ज़ आग उगलने लगते हैं 

"राज़" मालूम है हमको क्या तासीर है अपनी  
पत्थर हम छू भर लें तो वो पिघलने लगते हैं 

शनिवार, मार्च 24, 2012

आफताब छूने चले हो जल जाओगे....



मोम ही तो हो तुम पिघल जाओगे 
आफताब छूने चले हो जल जाओगे 

मैं तुमको जरा सा सोच भर लूँ 
तुम मेरे लफ़्ज़ों में ढल जाओगे 

दिल के घर में इक मेहमाँ ही तो थे 
पता था आज नहीं तो कल जाओगे 

तुम पर यकीं कर तो लूँ पर कैसे 
मौसम ही हो पक्का बदल जाओगे 

मरासिम हवाओं से जोड़ लो तो जरा 
चरागों फिर तुम भी संभल जाओगे 

ये मेरे गम हैं जो जवाब देते ही नहीं  
मैं रोज़ पूछता हूँ किस पल जाओगे 

सोमवार, मार्च 19, 2012

चाँद किसी को देखने के बहाने निकलता है



रात को थोड़े ही रौशन बनाने निकलता है 
चाँद किसी को देखने के बहाने निकलता है

जब सोचता हूँ उसकी याद मिटा दूँ जेहन से 
ख़त इक पुराना फिर सिरहाने निकलता है 

कभी आँखों से बहा, कभी सफ्हे पे उतरा है 
दर्द भी बदल बदल के ठिकाने निकलता है 

कौन है यहाँ पर जो रुदाद-ए-गम सुने मेरी  
हर कोई अपनी कहानी सुनाने निकलता है 

क़ज़ा के पहलू में जब रूठ जाती है जिंदगी 
फिर कहाँ कोई उसको मनाने निकलता है 

माना के जुबाँ तल्ख़ है ज्यादा ही "राज" की 
पर हर लफ्ज़ कुछ नया बताने निकलता है 

शनिवार, मार्च 17, 2012

रूठ कर जिंदगी और क्या ले जायेगी


रूठ कर जिंदगी और क्या ले जायेगी 
बस मेरे ये जिस्म-ओ-जाँ ले जायेगी 

चरागों तुम जरा खामोश जला करना 
अदा इक-इक तुम्हारी हवा ले जायेगी 

हमारे बाद ही तो तुम हमको तरसोगे 
जब ख़ामोशी हमारी सदा ले जायेगी 

हयात के परदे गिर जायेंगे उस रोज़ 
क़ज़ा जिस दिन हमे छुपा ले जायेगी