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गुरुवार, सितंबर 08, 2011

मेरी तरह वो शख्स भी तन्हा बहुत है



ये बात और है के आजकल हँसता बहुत है 
पर मेरी तरह वो शख्स भी तन्हा बहुत है 

उसकी इबादत करूँ तो क्यूँ हैराँ है ज़माना
उसका चेहरा जो खुदा से मिलता बहुत है 

उसके इंतज़ार में तो यूँ सदियाँ गुजार देंगे 
उसकी याद का हमे इक-2 लम्हा बहुत है 

मजबूरे-हालात था जो वफ़ा न कर सका 
मेरी निगाह में मगर वो अच्छा बहुत है 

"तुम मेरी जिन्दगी से कहीं जा नहीं रहे"
उसका मुझसे इतना बस कहना बहुत है 

ग़ज़ल के लिए 'राज़' नए उन्वाँ क्या लायें 
बस इक उसका नाम ही लिखना बहुत है 

शुक्रवार, सितंबर 02, 2011

दीवाने को तो सब अच्छा लगे है



हर इक चेहरे में तेरा चेहरा लगे है 
हिज्र में मुझको सब सेहरा लगे है 

मेरी हर सदा नाकाम लौट आयी
मुझे तो ये खुदा भी बहरा लगे है 

जाग उठा हूँ अचानक सोते-सोते 
शायद तेरी याद का पहरा लगे है 

खारों से रफाकात हुयी है जब से 
इन फूलों का ज़ख्म गहरा लगे है 

इस किनारे से उस किनारे तलक 
ये दरिया भी बहुत प्यासा लगे है 

उसकी हंसी पे मत जाइए "राज़"
दीवाने को तो सब अच्छा लगे है 

मंगलवार, अगस्त 16, 2011

खूबसूरत लफ़्ज़ों का फ़कीर नहीं हूँ मैं...



सच है के ग़ालिब, जौक, मोमिन, मीर नहीं हूँ मैं 
हाँ, पर खूबसूरत लफ़्ज़ों का भी फ़कीर नहीं हूँ मैं

मेरे जज्बों की भी कद्र होगी तुम मेरे बाद देखना 
क्या हुआ, जो के, नीरज, राहत, बशीर नहीं हूँ मैं 

मेरे कहे पे तो सुलग उठता है ये ज़माना ही सारा 
क्या करूँ आदतन मजबूर जो हूँ, कबीर नहीं हूँ मैं 

बहुत नाजुक, बहुत मासूम है, अंदाजो-बयां मेरा 
छू कर देखो मोम हूँ, कोई दहकता तीर नहीं हूँ मैं 

माना की ग़ज़ल है तीखी ये और कड़वे हैं शेर मेरे 
पर अहसास मेरे भी दिल में हैं, बे-पीर नहीं हूँ मैं 

शनिवार, अगस्त 13, 2011

फिर से मोहब्बत के वो ज़माने आ जाएँ



फिर से मोहब्बत के वो ज़माने आ जाएँ 
गर कैस जैसे कुछ और दीवाने आ जाएँ 

कभी वो बे-हिजाब बाम पे चल क्या पड़े  
ये चाँद सितारे सब जश्न मनाने आ जाएँ 

कोई परिंदा छत पे भले चहके ना चहके 
पर जिसे चाहें वो किसी बहाने आ जाएँ 

गर हो फलक के अब्र से बूंदों के करिश्मे 
सहरा में भी फिर मौसम सुहाने आ जाएँ 

आँखों की तश्नगी को भी आराम हो नसीब 
याद जो उसकी, पलक छलकाने आ जाएँ 

शब्-ए-गम की इन्तेहाँ भी हो किसी रोज 
सुबहें खुशियों की जो मुस्कराने आ जाएँ 

बुधवार, अगस्त 03, 2011

पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये



पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये 
फिर जी भरकर आप मुझको दुआ दीजिये 

और कौन यहाँ काफिर है कौन है मुसलमाँ
कभी मिलें गर जो ये मुझे भी बता दीजिये 

मेरी तासीर आब जैसी है पता चल जाएगा 
बस इक बार खुद को मुझमे मिला दीजिये 

कभी जो आँखों में मेरी उसके ख्वाब मिले 
जो चोर की हो वो ही मुझको सज़ा दीजिये  

जिसे लग गया हो आजार-ए-इश्क यहाँ पे 
उसे फिर क्या दुआ दीजिये के दवा दीजिये 

मकता भी संभल जाएगा, खूब शेर जमेंगे  
फ़िक्र बहर की आप,ग़ज़ल से हटा दीजिये 

गुरुवार, जुलाई 21, 2011

"सुबह के ५ बजे और याद उनकी......."


07/07/2011 सुबह ५ बजे जब रात ढली नहीं थी और सहर चली नहीं थी...
यूँ ही जेहन के दरिया में किसी का ख्याल मचल गया.... 
लफ़्ज़ों की कश्ती को सफहों के साहिल पे उतार लाया था.....
वही आपकी पेश-इ-खिदमत है..... 
इसे पढ़ते समय वक़्त का ख्याल जरुर रखियेगा.. "सुबह के ५ बजे और याद उनकी......."




शब् की सुर्खी कुछ उतर जाए तो चली जाना 
खुशबु फूलों से यूँ बिखर जाए तो चली जाना

अभी भी आसमाँ पे चांदनी छिटकी है जरा सी 
सहर लेकर के इसे जो घर जाए तो चली जाना

देखो तो मौसम भी गुलाबी हुआ नहीं है अभी 
रंगत कुछ इसकी निखर जाए तो चली जाना

अभी तो ये लफ्ज़ अंगड़ाइयां ही ले रहे हैं मेरे 
ग़ज़ल इनसे कोई संवर जाए तो चली जाना

नहीं जाते ....



माँ की आँखों से फिर आसूं टाले नहीं जाते 
जब बच्चों के गले में दो निवाले नहीं जाते 

ताउम्र पाल-पोस कर जिनको, बड़ा किया 
बच्चों से वही बूढ़े माँ-बाप पाले नहीं जाते 

ये तो जिगर है अपना, जो रौशन हैं वो भी 
जुगुनुओं के घर तो कोई उजाले नहीं जाते 

अब के सियासत में यहाँ पे ग़द्दार बहुत हैं 
परचम वतन के जिनसे संभाले नहीं जाते 

बुलंदी अक्सर हौसलों से मिला करती है
समन्दर में यूँ ही मोती खंगाले नहीं जाते 

इश्क में खुद को परवाना कहते हैं वो पर 
वफ़ा में कभी शम्मा के हवाले नहीं जाते

और "राज" जैसे भी हैं ठीक ही हैं यहाँ तो 
क्या हुआ जो मस्जिद या शिवाले नहीं जाते

रविवार, जुलाई 17, 2011

शाम ढलती है जब कहीं पर बवाल रखती है


शाम ढलती है जब कहीं पर बवाल रखती है 
चेहरे पे वो अपने तो रंग सुर्ख लाल रखती है 

उतर जाए है शब् की थकान उसकी आमद से 
सहर अपने अंदर कुछ ऐसा कमाल रखती है 

गम मिलता है तो लिपट जाता है खुद ही खुद 
ख़ुशी आये है जब तो कितने सवाल रखती है 

क्या कह डालूं वफादारी की बात उसकी यारों 
वो पगली आज भी ख़त मेरे संभाल रखती है 

अपनी दुआओं में अब भी नाम लेती है मेरा 
खुद से भी ज्यादा वो तो मेरा ख्याल रखती है 

अपने हालातों को बयां किसी से करती नहीं 
हंसी की ओट में छुपाकर के शलाल रखती है 

लफ़्ज़ों को करीने से यूँ ही नहीं सजाते "राज़" 
ग़ज़ल ही बज़्म में मेरे दिल का हाल रखती है 

तेरे बिना.....


ऐसा नहीं के बहुत कुछ नहीं बदला तेरे बिना 
पर हयात का कारवां गुजर तो रहा तेरे बिना 

सुकूँ होता है दिन में, नींद भी आती है रात को
कट जाती है जिन्दगी कतरा-कतरा तेरे बिना  

अब्र याद का आये भी मगर बरसात नहीं होती 
खामोश ही रहता है आँखों का दरिया तेरे बिना 

और अब ख्यालों में इंतज़ार की शाम नहीं है  
वक़्त गुजरा वो भी, ये भी गुजरेगा तेरे बिना 

रस्मे-उल्फत निभाई पर तुझे पा ना सके हम 
इश्क से रहेगा उमर भर ये शिकवा तेरे बिना 



शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

"आरज़ू" चाँद पाने की.....



दर्द का ये मंज़र भी इक रोज ठहर जाएगा 
मुसाफिर ही तो है कब तक किधर जाएगा 

अभी इन्हें छोड़ भी दो यूँ ही खुला रहने दो 
वक़्त बदलेगा सब ज़ख्मों को भर जाएगा 

रोज-ए-क़यामत जो कभी यूँ फैसला होगा 
इलज़ाम इश्क का दोनों के ही सर जाएगा 

और आज जो उकताया फिरे मुझसे बहुत 
कल हिज्र में मुझे ढूंढते इधर उधर जाएगा 

बहुत उड़ता है परिंदा आसमाँ में दूर तलक
थक गया जब कहीं तो लौट के घर जाएगा 

"आरज़ू" चाँद पाने की यूँ रख लो तुम "राज़" 
के हुआ कभी तो कोई सितारा उतर जाएगा