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शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

"आरज़ू" चाँद पाने की.....



दर्द का ये मंज़र भी इक रोज ठहर जाएगा 
मुसाफिर ही तो है कब तक किधर जाएगा 

अभी इन्हें छोड़ भी दो यूँ ही खुला रहने दो 
वक़्त बदलेगा सब ज़ख्मों को भर जाएगा 

रोज-ए-क़यामत जो कभी यूँ फैसला होगा 
इलज़ाम इश्क का दोनों के ही सर जाएगा 

और आज जो उकताया फिरे मुझसे बहुत 
कल हिज्र में मुझे ढूंढते इधर उधर जाएगा 

बहुत उड़ता है परिंदा आसमाँ में दूर तलक
थक गया जब कहीं तो लौट के घर जाएगा 

"आरज़ू" चाँद पाने की यूँ रख लो तुम "राज़" 
के हुआ कभी तो कोई सितारा उतर जाएगा 

रविवार, जून 19, 2011

इश्क में यूँ हर शख्स पागल नहीं होता



अहसास तेरा मुझको जिस पल नहीं होता 
साँसों का सिलसिला मुक़म्मल नहीं होता 

बस तेरी सूरत ही रक्स करती हैं आँखों में 
दूसरा चेहरा तो इनमे आजकल नहीं होता 

उसे आसान लगा है मुझको भूल जाना पर  
वो है के मेरी सोच से भी ओझल नहीं होता 

आजार-इश्क की यूँ कोई दवा नहीं मिलती 
चारागारों से भी तो मसला हल नहीं होता 

जब आँखों से बे-सबब अब्र का कारवां चले 
रोकने का फिर उसे कोई आँचल नहीं होता 

"राज़" खामोश हैं, तो क्या है अजीब इसमें 
अरे इश्क में यूँ हर शख्स पागल नहीं होता 

मंगलवार, जून 14, 2011

कोई हौसला ऐ हवा ना कर....



कहता हूँ कोई हौसला ऐ हवा ना कर 
मेरे चराग को बे-सबब छुआ ना कर 

सुलग उठते हैं उदासी से सफहे कई 
आंसुओं से ग़ज़ल को लिखा ना कर 

गर तेरे बस में नहीं है दुआ ना सही 
तू मगर किसी को भी बद्दुआ ना कर 

उसकी फितरत है ज़फायें तो रहने दे  
कौन कहता है तुझसे तू वफ़ा ना कर 

ये सख्त लोग हैं कैफियत ना समझे  
होकर यूँ मासूम जहाँ में रहा ना कर 

नज़र लग जाए ना कहीं डर है बहुत 
आईने में खुद को इतना पढ़ा ना कर 

सुना माह की नीयत भी अच्छी नहीं 
तो छत पे तन्हा उससे मिला ना कर 

वक़्त से पहले कुछ मिलता ना कभी    
किस्मत से बे-वजह यूँ गिला ना कर 

खुदा तेरी भी सुनेगा इक दिन "राज़" 
लिए ''आरज़ू'' अपनी यूँ फिर ना कर 

सोमवार, जून 06, 2011

बगैर सितारों का चाँद आसमान में देखो



बगैर सितारों का चाँद आसमान में देखो
हूँ तन्हा अब मैं बहुत इस जहान में देखो 

कौन आये जो मुझको दुआएं किया करे 
पड़ गए हैं आबले सबकी जुबान में देखो 

के छोड़  कर अब तो तेरा शहर हम चले 
है दर्दो-गम और तन्हाई सामान में देखो 

हो गयी है इक सिफर सी अब ये जिंदगी 
आ गए हैं कितने सवाल इंतेहान में देखो 

देख कर भी वो ना देखने का बहाना करे 
हो चले हैं कई फासले दरमियान में देखो 

सिवा उसके किसी के ख्याल नहीं बसते 
कोई और नहीं रहता इस मकान में देखो 

किसी की याद में बरसा है ये अब्र टूट के  
पे लोग खुश हैं बारिश के गुमान में देखो  

और ''आरज़ू'' है के पूरी नहीं होती "राज़" 
कोई नुक्स ही होगा अपने बयान में देखो 

Note:-जौन एलिया साहब की एक ग़ज़ल की ज़मीं से.....

गुरुवार, जून 02, 2011

तेरी कुर्बत-ओ-रफ़ाक़त के ज़माने चले



तेरी कुर्बत-ओ-रफ़ाक़त के ज़माने चले
जेहन से जब कभी तुझको भुलाने चले 

दिन भर फिरे बेसबब ही परिंदा लेकिन 
लौटकर वो शाम अपने ही ठिकाने चले

इश्क के कारोबार का है ये हासिल देखो 
नफे में बस दर्द-ओ-गम के खजाने चले 

इक तेरे दर पे ही है तेरे बंदे को आसरा 
ऐ खुदा तू बता कहाँ अब ये दीवाना चले 

फिर से दोस्तों पे ऐतबार कर लिए हम 
लो के एक धोखा और फिर से खाने चले 

हमने कोई शिकवा ना गिला रखा उनसे 
हाँ, उनके ना आने के हज़ारों बहाने चले 

उसे तो रास ना आयी थी ये ग़ुरबत मेरी 
जाविदाँ मुहब्बत में ऐसे भी फ़साने चले 

अपनी 'आरज़ू' ही तो कही है तुमने 'राज़'
बस ग़ज़ल है ये नई,पर जिक्र पुराने चले 

शनिवार, मई 28, 2011

आंसुओं में ही इक हंसी मिल जाए



आंसुओं में ही इक हंसी मिल जाए 
काश मुझे ऐसी ही खुशी मिल जाए 

एक मुद्दत से तरसी हैं आँखें बहुत 
बस इक जरा सी रौशनी मिल जाए 

मैं पागलों की तरह फिरता हूँ यहाँ 
शायद सुकूँ की जिंदगी मिल जाए 

कहती है वो अदू को बेहतर मुझसे 
आईने देखूं,शायद कमी मिल जाए 

कयामत तलक गुनाह कौन झेले 
के जो भी है सज़ा यहीं मिल जाए 

काफ़िर की दुआ पहुंचे खुदा के दर 
मानो आसमाँ से जमी मिल जाए 

अपने नसीब पे ''राज़'' भी करें फक्र 
पूरी जो वो 'आरज़ू' कभी मिल जाए 

रविवार, मई 22, 2011

उसे इंकार हो जितना वो करता रहे



के उसे इंकार हो जितना वो करता रहे 
दिल है के दिन रात उसपे ही मरता रहे 

मेरा इश्क तो है, मानिंद-ए-खुशबू कोई 
समेटूं जितना ये उतना ही बिखरता रहे 

मुझे पता है उसके दिल में है क्या छुपा 
सामने गर मुकरता है तो, मुकरता रहे 

रोज़ आयें उसकी हसरत ले के ये सितारे 
मुआ चाँद है के चौदहवीं तक संवरता रहे 

"राज़" लिख दें नाम ग़ज़ल में "आरज़ू"
सच है के हर लफ्ज़ फिर निखरता रहे 

मंगलवार, मई 17, 2011

बारिशों के मौसमों में पतंगें उडाई जाएँ



चलो के किस्मतें कुछ यूँ आजमाई जाएँ 
बारिशों के मौसमों में पतंगें उडाई जाएँ

उसकी इबादत में खुद को लगा रखो तुम 
कब जाने खुदा तक, तुम्हारी दुहाई जाएँ 

गिला-शिकवा ये जफा-वफ़ा क्या है यहाँ 
ऐसी बातें तो मुहब्बत में ना उठाई जाएँ 

कौन कहता है के वो भूल गया है मुझको 
अरे हिचकियाँ देखो आई जाएँ आई जाएँ 

तू मुझसे मैं तुझसे खफा हैं तो हुआ करें 
तमाम शहर को रंजिशें ना दिखाई जाएँ 

जब ना हो पूरी कोई "आरज़ू" तेरी "राज़"
अपनी हसरतें आईने को ही सुनाई जाएँ 

शनिवार, मई 14, 2011

अब जिंदगी इम्तेहान जैसी है



मुझे लगती बियाबान जैसी है 
अब जिंदगी इम्तेहान जैसी है 

ज़मीं की खाक है औकात मेरी  
वो लड़की तो आसमान जैसी है 

फितरते-दिल को क्या कहिये 
किसी परिंदे की उड़ान जैसी है 

हर रोज दर्द ले के बढ़ जाती है  
अब ये सांस भी लगान जैसी है 

तुझे सोचता हूँ तो टूट जाता हूँ 
तेरी याद तो बस थकान जैसी है 

बिना सिक्कों से ये चलती नहीं 
के रिश्तेदारी भी दुकान जैसी है 

मौत तो मुक्क़मल ही हैं यहाँ पे 
अपनी रूह ही बे-ईमान जैसी है 

माँ की दुआ ही परदेस में यारों 
सुकून-ओ- इत्मिनान जैसी है 

'राज़' कहें क्या 'आरज़ू' अपनी 
यहाँ पे वही तो पहचान जैसी है 

शुक्रवार, मई 13, 2011

इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे



बेचैन रहेंगे कुछ, कुछ घबराए फिरेंगे 
यूँ इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे 

काज़ल से करेंगे वो शामो के करिश्मे 
चाँद को चेहरे से फिर चमकाए फिरेंगे 

सखियाँ जो छेड़ देंगी कभी नाम से मेरे 
छुप जायेंगे कहीं पे और शरमाये फिरेंगे 

मौसम की रंगत होगी होठों से ही उनके
पैरहन की खुशबू से सब महकाए फिरेंगे 

रखेंगे नाम-ए-'आरज़ू' ''राज़'' जो उनका 
सच है के हर्फ़-ए-ग़ज़ल बल खाए फिरेंगे