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शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

फूलों की सादगी और बादे सबा लगती हो


फूलों की सादगी और बादे सबा लगती हो
खुदा के दर तक पहुंचे वो दुआ लगती हो

शाम तुम्हारे गेसुओं के साए में पलती है 
सहर हो जिस से वो ताजा हवा लगती हो 

तुम्हारे दीद से सजदे का मन हो जाता है 
काफिरों को जैसे सूरत-ए-खुदा लगती हो 

सहरा में हैं जो बशर जाकर उनसे पूछो 
उनके दर के मौसमो का पता लगती हो 

तारीकियाँ जब भी मेरे घर में बिखरती है 
तुम चाँद तो कभी जलता दिया लगती हो 

मेरी मंजिलें ना रहीं काफिला ना रहा


मेरी मंजिलें ना रहीं काफिला ना रहा 
बगैर उसके कोई सिलसिला ना रहा 

चले आये थे क्यूँ तुम लूटने चमन को 
गुल यूँ अभी तो एक भी खिला ना रहा 

मेरे रकीब से वो जब मिल गया यारों 
इश्क में लुट जाने का हौसला ना रहा 

जर्द पत्तों ने खुद ही आँधियों को सौंपा 
दर्द से सहमे शजर का फैसला ना रहा 

मेरा हमराज था पर धोखा कर गया 
गैरों से कभी फिर हमे गिला ना रहा

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

इक ऐसी भी शाम आई है


इक ऐसी भी शाम आई है 
के वो तो है पर तन्हाई है 

मौसम--मंजर सूने-सूने 
ना साया है ना परछाई है 

देगा कौन गवाही मेरी 
जिसको देखो हरजाई है 

उनके कूचे छोड़ दिए हैं 
डर है उसकी रुसवाई है 

जब गुजरी बेख़ौफ़ हवा 
अश्कों से शमा जलाई है

वहम है मेरा या सच है 
ये किसने सदा लगाई है 


बुधवार, मार्च 31, 2010

याद करता भी जाएगा भुलाता भी जायेगा


याद करता भी जाएगा भुलाता भी जायेगा 
जख्मो पे मेरे यूँ नमक लगाता भी जायेगा 

साहिल-ओ-मौज का तजुर्बा रखता है खुद में 
पास आता भी जायेगा दूर जाता भी जायेगा 

अब्र जब भी फलक के रूबरू बैठा करेगा यूँ 
हर सहरा को गुलिस्ताँ बनाता भी जायेगा 

अपने दर्द की लज्जत खुद ही खुद में रखेगा 
जब भी मिलेगा ज़रा मुस्कुराता भी जायेगा 

मेरी आदतें उसने यूँ तो बिगाड़ रखी हैं बहुत 
मुझसे रूठेगा मगर मुझे मनाता भी जायेगा 

मेरी खताओं का मुझपे इल्जाम लगा देगा 
और हर सजाओं से फिर बचाता भी जायेगा

शनिवार, मार्च 27, 2010

आज फिर आँख नम है


उसके जाने का गम है 
आज फिर आँख नम है 

सांस तो चल रही है पर 
सीने में बाकी ना दम है 

लबों पे हंसी रखूं कैसे 
दर्द कहाँ भला कम है 

ये बहारें बेमानी सी हैं
क्या हिज्र का मौसम है 

ख्याल से निकालूं कैसे 
एक वो ही तो भरम है

गुरुवार, मार्च 25, 2010

तन्हाई में......


अब तो आँखों का रतजगा होता है तन्हाई में 
ना सांस चलती है ना दिल सोता है तन्हाई में 

बिछड़ कर वो भी तो कहीं खुश नहीं रह पाया 
बेसबब याद कर मुझे बहुत रोता है तन्हाई में 

किसी आईने सी जब ये रात बिखर जाती है 
चुन-2 के दिल ये जज्बे संजोता है तन्हाई में 

बादे-सबा जब भी उसकी खुशबू सी ले आती है 
पलकों का कोहसार मुझे भिगोता है तन्हाई में 

दर्द जब कभी बे-इन्तेहाँ ही बढ़ जाता है मेरा 
लहू-ए-चश्म ही हर जख्म धोता है तन्हाई में 

मुझमे मौसमों सी बदलती सूरते मिलती हैं 
जाने कैसी-2 फसलें दिल बोता है तन्हाई में

सोमवार, मार्च 22, 2010

अब ना गम रहा ना कोई मलाल रहा


अब ना गम रहा ना कोई मलाल रहा 
के जब से दिल में ना तेरा ख्याल रहा 

हसरतें जिंदगी की सब मिट गयीं यूँ 
ना हंसी रही ना आँखों में शलाल रहा 

तेरे हुस्न के मारे अब जियें कैसे बता 
संगदिल से बस यही एक सवाल रहा 

अपने माजी से ही तकरार हुई अपनी 
ये आलम-ओ-मंजर सालो-साल रहा 

खुद ही खुद की तबाही का सबब हुए 
किसी से ना कभी हमको बवाल रहा 

रो-रो के हँसे, हंस-हंस के रोया किये 
वहशत में उसकी, ऐसा भी हाल रहा

दर्द ही जिंदगी का इक हमसफ़र रहा


वो मेरे जख्मों से जबसे बेखबर रहा 
दर्द ही जिंदगी का इक हमसफ़र रहा 

खामोश रह गए तो गुनहगार हो गए 
बेवफाई का इल्जाम मेरे ही सर रहा 

नहीं बहला था दिल शाम के आने से 
मन्जर तन्हाई का फिर रात भर रहा 

बात कर लेते तो शायद सुलझ जाती 
रुसवा होने का मगर उनको डर रहा 

यूँ तो आसमाँ में बर्क बहुत चमकी 
निशाना सिर्फ एक मेरा ही घर रहा

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

अहदे वफ़ा कुछ यूँ भी निभाते रहे


अहदे वफ़ा कुछ यूँ भी निभाते रहे 
जख्म खाके भी हम मुस्कराते रहे 

मौज आयी गर तो बिखर जाएगा 
ये जानके भी रेत पे घर बनाते रहे 

जिसकी आमद पे आँखे खुली रही 
सिवाय उनके सभी लोग आते रहे 

न की रकीबों से भी रकीबत हमने 
बस सबसे दुआ सलाम उठाते रहे 

कोई संजीदा शख्स मिला जब यूँ 
उसको भी सीने से हम लगाते रहे 

औ कैसे मेरी यादों के हर्फ़ मिटाए 
सुना शब् भर ख़त मेरे जलाते रहे

परिंदा हूँ कफस से डरता नहीं हूँ



सैयाद से मैं गिला रखता नहीं हूँ 
परिंदा हूँ कफस से डरता नहीं हूँ 

बेवफा हो जाना है फितरत तेरी 
शिकवा तुझसे मैं करता नहीं हूँ 

कुछ यादों का असीर तो हूँ मगर 
मयखाने में कभी मिलता नहीं हूँ 

आफताब हूँ हौसला ना आजमा 
शब्-ए-चराग सा जलता नहीं हूँ 

क़ज़ा का वक़्त जब है मुक्क़मल 
हर लम्हा इसलिए मरता नहीं हूँ 

बेख़ौफ़ से शजर की नस्ल है मेरी 
आंधी में तिनके सा उड़ता नहीं हूँ 

कायम रखता हूँ रुख आसमाँ सा 
मौसम सरीखा मैं बदलता नहीं हूँ