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मंगलवार, अक्टूबर 06, 2009

वो जो महफ़िल में हमसे कुछ परे बैठे हैं



वो जो महफ़िल में हमसे कुछ परे बैठे हैं
हम तो उनसे मिलने की आस धरे बैठे हैं

यूँ तो कभी होते नहीं वो हमख्याल हमसे
एक हम हैं जो जमाने से उनपे मरे बैठे हैं

हम तो शुमार करते हैं अजीजों में उनको
ना जाने क्यूँ वो हमसे अदावत करे बैठे हैं

के शायद किस्मत ही तंग है कुछ अपनी
सिवा हमारे ही यहाँ सब उनके वरे बैठे हैं

कभी तो होगा उनका रुख अपनी जानिब
यही इक ख्वाब"राज"आँखों में भरे बैठे हैं

गुरुवार, अक्टूबर 01, 2009

कुछ मौसम के फ़साने की बात करो



कुछ मौसम के फ़साने की बात करो
कुछ अपने दिल दीवाने की बात करो

इश्क की बातें तो यूँ सब किया करे हैं
कुछ तुम अलग ज़माने की बात करो

हर एक इल्जाम सर मेरे कर के तुम
चुपके से निकल जाने की बात करो

गर सदा नाकाम लौटे उस दर से तो
काफिरों से हाथ उठाने की बात करो

मजबूर हालात हों, कोई साथ ना दे
कुछ गैरों से भी निभाने की बात करो

सन्नाटा गली के मोड़ तक फैलने लगे
तुम घर में चराग जलाने की बात करो

'हीरों' ने हमे कभी काबिल नहीं समझा
"राज" अब संग आजमाने की बात करो

बुधवार, सितंबर 23, 2009

तुम्हे छूकर गुलाब कर दूंगा


तुम्हे छूकर गुलाब कर दूंगा
पूरा हर एक ख्वाब कर दूंगा

तुम हिज्र में शिकवे लिख लेना
मैं वस्ल में सब हिसाब कर दूंगा

तुमको शौक है ना माह होने का
अमावस में ये भी खिताब कर दूंगा

जब भी ग़ज़ल में तारे लिखूंगा
तुमको उसमे माहताब कर दूंगा

नजर कहीं न मेरी ही लग जाए
अपने आँखों को नकाब कर दूंगा

खुशगवार लम्हों को तुम पढ़ा करना
जीस्त को मुक़म्मल किताब कर दूंगा

अपने जख्मो की यूँ दास्ताँ कह देना
मैं मरहम कोई लाजवाब कर दूंगा

गुरुवार, सितंबर 17, 2009

जब भी ख़त में मौसम लिखना



जब भी ख़त में मौसम लिखना
मुझको उसमे सावन लिखना

खुद को कुरबत सब दे देना
मुझे हिज्र का आलम लिखना

इश्क में तेरे बन बैठे पागल
बात यही तुम हरदम लिखना

बादे सबा जब चले शहर से
आँखे अपनी पुरनम लिखना

सबसे मिलना हंसते रहना
मेरे जानिब सब गम लिखना

लौटूंगा मैं इक रोज देखना
इन्तजार बस कायम लिखना

बुधवार, सितंबर 09, 2009

इक रोज उसे यूँ ही, सीने से लगा लूँ मैं




सोचा करता हूँ ये तोहमत भी उठा लूँ मैं
इक रोज उसे यूँ ही, सीने से लगा लूँ मैं

हलकी हलकी बूंदें जो फलक पे बरसी हों
उसको मिलने फिर, इक शाम बुला लूँ मैं

आलम पे अब्रों का, जब साया बिखरा हो
मौसम की बाहों से इक लम्हा चुरा लूँ मैं

नींद मुझे जब भी उसकी बांहों में आये
ख्वाब सुनहरे सब पलकों में सजा लूँ मैं

हवा के झोंके से जो उसकी खुशबू आये
गुलशन के गुल को हमराज बना लूँ मैं

'राज' जो दिल में हैं तुम सुनने ना आओ
गज़लों में ही दिल की हर बात बता लूँ मैं

बुधवार, सितंबर 02, 2009

देता हूँ हर घड़ी अब मैं दुआ उसको



देता हूँ हर घड़ी अब मैं दुआ उसको
उसने ना करी पर मिले वफ़ा उसको

तारीक-ऐ-शब् हासिल हो मुझी को
नसीमे सहर पर बख्शे खुदा उसको

कदर करो गर कभी रहे रूबरू तुमसे
बिछड़ेगा तो रहोगे देते सदा उसको

अहदें किसी से तुम ना किया करना
जब तक के यूँ पाओ ना निभा उसको

किसी से इश्क हो तो चुप नहीं रहना
थाम के कलाई बस देना बता उसको

लबों पे कभी कोई मुस्कान खिला दे
उसे दुआ करना कहना भला उसको

मौसम जो तुमसे कुछ यूँ रूठा बैठा है
सब्ज रुतो में 'राज' लेना बुला उसको

मंगलवार, अगस्त 25, 2009

शब् ने यूँ पलकें बिछा रखीं थी कल



शब् ने यूँ पलकें बिछा रखीं थी कल
शाम से ही हो रही इक जैसे ग़ज़ल

चाँद चुपके से नदी में आ गया था
महक उठा रौशनी से हर एक पल

मुझको भला क्यूँ सहरा कहता है
गर तू समंदर है तो मेरे साथ चल

मेरे हबीब मुझको कम समझते हैं
जानना हो तो, मेरा रकीब निकल

सब्र आता नहीं मुहब्बत में जिन्हें
भटकते हैं वो उम्र भर होके पागल

रविवार, अगस्त 23, 2009

कभी ख्वाबों की बात करता है



कभी ख्वाबों की बात करता है
कभी किताबों की बात करता है

सवाल होके भी वो मुझसे क्यूँ
अपने जवाबों की बात करता है

मौसमे सेहरा होता है फिर भी
खिलते गुलाबों की बात करता है

परिंदों के हक में फैसला कौन दे
सय्याद अताबों की बात करता है

अब्र के साए जब चाँद मिलता है
उसके हिजाबों की बात करता है

वाइज भी मयकदे में मिला था
तो क्यूँ सवाबों की बात करता है

जो मुल्क के गद्दारों में शामिल है
मुझसे इन्कलाबों की बात करता है

बुधवार, अगस्त 19, 2009

कांच सा उसका नाजुक नाजुक दिल लगता है



कांच सा उसका नाजुक नाजुक दिल लगता है
अब वो तो मुझको अपनों में शामिल लगता है

ज़ख्म भी देता है, और फिर दुआ भी करता है
जाने कैसा है वो, एक प्यारा कातिल लगता है

अक्सर मेरे ख्वाबों में यूँ आया जाया करता है
मेरी उम्मीदों का बस इतना हासिल लगता है

मैं खुद को बेखौफ सा बहता दरिया कहता हूँ
मेरी राहों को थामे, वो ऐसा साहिल लगता है

दिल अपने सब "राज" उसको सुनाया करता है
इस दुनिया में एक वो ही तो काबिल लगता है

रविवार, अगस्त 16, 2009

उसे बेसबब मेरी याद आई होगी


उसे बेसबब मेरी याद आई होगी
शाम ने जब सुर्खी बिखराई होगी

एक मैं ही नहीं शब् भर जागा था
उन आँखों ने भी नींद भुलाई होगी

हाथ आया होगा पुराना ख़त जब
पढ़के हर्फों को वो मुस्कराई होगी

हवा के झोंके की इक आहट पे भी
नजरें राहों तक उसने उठाई होगी

जिक्र जब भी चाँद का हुआ होगा
हौले हौले से वो भी शरमाई होगी

थम गयी होंगी उसकी बेचैन साँसें
मेरे आने की खबर जब पाई होगी

पलकें नम दिल बेकरार हुआ होगा
मेरी ग़ज़ल उसने जब सुनाई होगी

इक आइना ही था उसका महरम
हर बात उसको ही तो बताई होगी