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बुधवार, अगस्त 12, 2009

हमको वो माहे-ईद का दीदार नजर आता है



हमको वो माहे-ईद का दीदार नजर आता है
चिलमन से जब तेरा रुखसार नजर आता है

इस झलक जो तेरी गर कोई देख ले कहीं से
उमर भर वो शख्स मयख्वार नजर आता है

निगाहे-नाज जो अपनी सेहरा पे डाल दो यूँ
वो सेहरा नहीं रहता गुलजार नजर आता है

लब पे जो चली आती है तबस्सुम हलकी-२
तो चमन का हर गुल शर्मशार नजर आता है

आती हो तुम जिसके ख्वाबों में रात रात को
ज़माने को दीवाना शबे बेदार नजर आता है

सजदा जिस रोज से वो करने लगे तुम्हारा
खुदा उस बंदे को फिर बेकार नजर आता है

तेरे हुस्न की तारीफ में अब और क्या कहें
के तेरे आगे हूर भी निगुंसार नजर आता है

खिजां की आँख भी नहीं उठती मेरी जानिब
जबसे "राज" तू रु-ऐ-नौबहार नजर आता है

शनिवार, अगस्त 08, 2009

'प्यारा पागल' खुशगवार हूँ मैं



बहुत बेबस बहुत लाचार हूँ मैं
तेरी दीद का, तलबगार हूँ मैं

तूने लाके जिस मोड़ पे छोडा
लगता के जैसे गुनहगार हूँ मैं

तेरे होने से आबाद हुआ था
आज उजड़ता सा दयार हूँ मैं

मेरी बेबसी कोई क्या समझे
दिल से कितना, बेजार हूँ मैं

उसकी यादें तो यूँ साथ हैं मेरे
पर दर्द की सहमी फुहार हूँ मैं

नहीं आएगी लौट के रुत वो
फिर भी एक इन्तजार हूँ मैं

मेरी वहशत हावी है मुझपे के
'प्यारा पागल' खुशगवार हूँ मैं

जिन्दगी जीने को सजा लगती है



जिन्दगी जीने को सजा लगती है
अब ये सब उसकी रजा लगती है

मैं मांगता हूँ वो भी नहीं मिलती
तंग मुझसे तो ये कजा लगती है

शब् के आगोश में सो जाऊं कैसे
नींद की गहराई बेवफा लगती है

तेरे जूनून के वहशी जाते किधर
जंजीरों की अच्छी सदा लगती है

खतावार हूँ मैं उस हमनफस का
जो कम उसको ये वफ़ा लगती है

यूँ तो मर मर के भी जी लेंगे ही
हमको तेरी ख़ुशी बजा लगती है

रविवार, अगस्त 02, 2009

वो...........



किसी शायर के ख्वाब जैसी है
वो एक खिलते गुलाब जैसी है

क्यूँ लोग संग कहते हैं उसको
वो तो दरिया के आब जैसी है

बड़ा आसान है तार्रुफ़ उसका
वो एक खुली किताब जैसी है

उसके दीदार से नशा छाता है
वो मयकदे की शराब जैसी है

सितारे देख के उसे शर्माते है
वो खुद एक माहताब जैसी है

कोई सवाल कैसे करे उस से
वो सुलझे हुए जवाब जैसी है

वो गुल है खुशबू है केसर की
वो वादियों में चनाब जैसी है

मौसमों में उसकी गुफ्तगू है
वो बहारों के आदाब जैसी है

हया के आईने भी रखती है
वो सरे बज्म नकाब जैसी है

शुक्रवार, जुलाई 31, 2009

अच्छा लगता है



तुमको यूँ ही सताना अच्छा लगता है
रूठ जाती हो मनाना अच्छा लगता है

एक तुमको ही तो मैं अपना कहता हूँ
वादा तुमसे निभाना अच्छा लगता है

कोई नहीं यहाँ, जो दिल के जज्बे सुने
हर बात तुम्हे बताना अच्छा लगता है

जब भूलने लगती है ये दुनिया यूँ मुझे
तुम्हारा वो याद आना अच्छा लगता है

सरे राह मिलती हैं जब नजरे नजर से
दांतों से पल्लू दबाना अच्छा लगता है

छेड़ देता है जब अब्र जुल्फों के तार को
करीने से जूड़ा सजाना अच्छा लगता है

पलकों की नम कोरें यूँ, अच्छी लगती हैं
बेसबब कभी मुस्कराना अच्छा लगता है

इन्तजार का लुत्फ़ यूँ ही ले लेता हूँ मैं
किया वादा तेरा भुलाना अच्छा लगता है

सुना जब भी बातें तेरे अपनों का होतीं है
जिक्र मेरा उनमे उठाना अच्छा लगता है

चैन से सोने की बात तो करते हैं "राज"
पर ख्वाब में तेरा आना अच्छा लगता है

बुधवार, जुलाई 29, 2009

मैं और मेरा तन्हा चाँद



रात रात भर जगते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद
बेचैन बहुत हैं लगते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद

शब् से एक गुजारिश करते के, तू यूँ ही ना कट जाना
सहर के होने से डरते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद

मेरे दिल का आलम वो जाने, पीर मैं उसकी जाने हूँ
खामोशी में बातें करते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद

शाम ढले वो आ जाता है, बाम पे मुझसे मिलने को
एक दूजे पर हैं मरते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद

उसके संग सितारे हैं और, मेरे संग में रंगीं नजारे हैं
पर तन्हाई को सहते दोनों, मैं और मेरा तन्हा चाँद

सोमवार, जुलाई 27, 2009

जिधर देखते हैं बस तुझे ही उधर देखतें हैं



तेरे इश्क के बिस्मिल अब किधर देखते हैं
जिधर देखते हैं बस तुझे ही उधर देखतें हैं

ऐब तेरे हुस्न में अब एक नहीं मिलता हमे
जब भी देखतें हैं हम तो बस हुनर देखतें हैं

छलकता है जब अर्क जबीं से आरिज पे तेरे
हम उस दम आलम-ऐ-रुख पे गुहर देखतें हैं

अब तो मयखानों में दिल लगा नहीं करता
तेरे मयकश लबों से अपनी गुजर देखतें हैं

उनके पास भी इलाज नहीं दिल-ऐ-बीमार का
चारागर जब भी मेरा ये एक जिगर देखते हैं

अपने घर की छत पे आते तो हैं माहे ईद देखने
चाँद रहता है उधर मगर हम तेरे इधर देखतें हैं

वो दिन हमे ईद का दिन लगता है यूँ ही कभी
जिस रोज तुमसे मिलती अपनी नजर देखतें हैं

इंतजार की हद, क्या कहे "राज" अब तुमसे
के शाम से ही उठ उठ के बस सहर देखतें हैं

बुधवार, जुलाई 22, 2009

खुद को कुछ ऐसे भी आजमाता रहा


मैं रेत पर यूँ ही,एक घर बनाता रहा
खुद को कुछ ऐसे भी आजमाता रहा

कागजी फूलों से खुशबु नहीं आती है
जान के भी उन्हें मेज पे सजाता रहा

लौट आये वो शायद दुआ सुनकर ही
होके काफिर भी, मैं हाथ उठाता रहा

खुदा हो जाने का यकीन ना होने पाए
करके गुनाह ये वहम भी मिटाता रहा

दर्द जब अपनी हद पे पहुँच गया मेरा
रात भर आँखों से शबनम बहाता रहा

हवा की आहटें, जब पायलों सी लगीं
बेसबब दरवाजे तक आता जाता रहा

शनिवार, जुलाई 18, 2009

ये कारी-कारी कजरारी आँखें




ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें
सुरमे से हैं, कुछ यूँ सजी हुई
जग से जैसे, मतवारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

इनका झुकना, इनका उठना
बंद कली का हो जैसे खिलना
नजर डाल कर जब भौंरे देखें
बस शर्म से मारी मारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

ये चेहरे की भाषा, पढ़ लेती हैं
कुछ नए स्वप्न यूँ गढ़ लेती हैं
एक झलक गर देख लो इनको
होंगी तुम पर वारी वारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

खुशियों में खुश मिल जाती हैं
हो गम तो कुछ खिल जाती हैं
पर किसी से कुछ ना कहती हैं
होती अजब सी हैं बेचारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

सब राजों को अयाँ ये कर देंगीं
सब बातों को बयाँ ये कर देंगीं
मेरा दिल कोई क्या समझेगा
समझेंगी सिर्फ तुम्हारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

बुधवार, जुलाई 15, 2009

कभी तुम भी अपना वादा निभाया करो




कभी तुम भी अपना वादा निभाया करो
मेरे याद करने से पहले याद आया करो

आँखें रात भर रास्ता तुम्हारा तकती हैं
किसी रोज ख्वाब में आके चौंकाया करो

बद्दुआ बेशक मुझे तुम यूँ ही करते रहना
इसी बहाने नाम मेरा लबों पे लाया करो

मुझको अब जख्म नयी बात नहीं लगते
वफ़ा की जो हो सजा आके सुनाया करो

बाम पे आता हूँ मैं बस तुम्हारी खातिर
ईद का ही सही माहताब बन जाया करो

गर शक हो तुमको मेरे इश्क के जज्बों पे
मांग के जान तुम मुझको आजमाया करो

सबा आयेगी तो बहार लाएगी जरुर "राज"
रौशनी बिखरेगी घर के ये पर्दे उठाया करो