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बुधवार, जुलाई 22, 2009

खुद को कुछ ऐसे भी आजमाता रहा


मैं रेत पर यूँ ही,एक घर बनाता रहा
खुद को कुछ ऐसे भी आजमाता रहा

कागजी फूलों से खुशबु नहीं आती है
जान के भी उन्हें मेज पे सजाता रहा

लौट आये वो शायद दुआ सुनकर ही
होके काफिर भी, मैं हाथ उठाता रहा

खुदा हो जाने का यकीन ना होने पाए
करके गुनाह ये वहम भी मिटाता रहा

दर्द जब अपनी हद पे पहुँच गया मेरा
रात भर आँखों से शबनम बहाता रहा

हवा की आहटें, जब पायलों सी लगीं
बेसबब दरवाजे तक आता जाता रहा

शनिवार, जुलाई 18, 2009

ये कारी-कारी कजरारी आँखें




ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें
सुरमे से हैं, कुछ यूँ सजी हुई
जग से जैसे, मतवारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

इनका झुकना, इनका उठना
बंद कली का हो जैसे खिलना
नजर डाल कर जब भौंरे देखें
बस शर्म से मारी मारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

ये चेहरे की भाषा, पढ़ लेती हैं
कुछ नए स्वप्न यूँ गढ़ लेती हैं
एक झलक गर देख लो इनको
होंगी तुम पर वारी वारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

खुशियों में खुश मिल जाती हैं
हो गम तो कुछ खिल जाती हैं
पर किसी से कुछ ना कहती हैं
होती अजब सी हैं बेचारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

सब राजों को अयाँ ये कर देंगीं
सब बातों को बयाँ ये कर देंगीं
मेरा दिल कोई क्या समझेगा
समझेंगी सिर्फ तुम्हारी आँखें

ये कारी-कारी कजरारी आँखें
लगती हैं, प्यारी प्यारी आँखें

बुधवार, जुलाई 15, 2009

कभी तुम भी अपना वादा निभाया करो




कभी तुम भी अपना वादा निभाया करो
मेरे याद करने से पहले याद आया करो

आँखें रात भर रास्ता तुम्हारा तकती हैं
किसी रोज ख्वाब में आके चौंकाया करो

बद्दुआ बेशक मुझे तुम यूँ ही करते रहना
इसी बहाने नाम मेरा लबों पे लाया करो

मुझको अब जख्म नयी बात नहीं लगते
वफ़ा की जो हो सजा आके सुनाया करो

बाम पे आता हूँ मैं बस तुम्हारी खातिर
ईद का ही सही माहताब बन जाया करो

गर शक हो तुमको मेरे इश्क के जज्बों पे
मांग के जान तुम मुझको आजमाया करो

सबा आयेगी तो बहार लाएगी जरुर "राज"
रौशनी बिखरेगी घर के ये पर्दे उठाया करो

बुधवार, जुलाई 08, 2009

रात भर मेरी ग़ज़ल कोई गुनगुनाया करता है




रात भर मेरी ग़ज़ल कोई गुनगुनाया करता है
मेरे ख्वाबों में यूँ ही बस, आया जाया करता है

सर झुकाया करता हूँ, तो ख्यालों में आता है
सर उठाया तो आईने सा, मुस्कराया करता है

मैं छोड़ देता हूँ, ये दीवारो-दर बे-तरतीब जब
घर मेरा कौन भला जागकर सजाया करता है

बड़ा दिलदार बेदिल है यारों मातम नहीं करता
मेरे वीराने को भी, अश्कों से महकाया करता है

एक रोज सोचता हूँ, छुप छुप के ये सब देख लूँ
कौन है जो ये चूडियाँ घर में खनकाया करता है

मेरी मायूसियों का बड़ा ख्याल रखता है "राज"
शाम ढलती है तो खुद चराग जलाया करता है

सोमवार, जुलाई 06, 2009

जो दर्द दे उसको भुला देना अच्छा




जो दर्द दे उसको भुला देना अच्छा
ज़ख्म हो जाए तो दवा देना अच्छा

और गर यादें नासूर बन जाएँ कभी
उनको दिल से ही मिटा देना अच्छा

तनहा रहके हासिल कुछ नहीं होता
शानो पे रखके सर बता देना अच्छा

जो थाम ले तेरे आरिज पे ढलके अश्क
हर वादा उस से ही निभा देना अच्छा

ये बहारें तेरे जानिब आने को बेताब हैं
अब तो घर के परदे उठा देना अच्छा

मुस्कराने का तुमको भी तो हक है'राज'
हंसी को अब लबों का पता देना अच्छा

मंगलवार, जून 30, 2009

अपनी इन ग़ज़लों में, उसकी जवानी रखता हूँ




उसके खूबसूरत अहसासों की कहानी रखता हूँ
अपनी इन ग़ज़लों में, उसकी जवानी रखता हूँ

आसमाँ सी चाहत तो है मुझे दूर तक जाने की
पर अपने क़दमों पे जमीं की निशानी रखता हूँ

और कुछ नहीं कहता आज भी मैं उनके सामने
अपने बुजुर्गों के लिए आँख में पानी रखता हूँ

दुश्मनों को दोस्तों से कभी कम नहीं आंकता
उनके लिए यह सोच अपनी सयानी रखता हूँ

कौन आएगा लेने टक्कर मुझसे मेरी जानिब
एक हाथ में कजा एक में जिंदगानी रखता हूँ

इश्क में बेवफाई करती रहे ये हक है उसको
वफादारी में खुद सा ना कोई सानी रखता हूँ

लाख सितम करे कोई पर उफ़ भी नहीं करता
अपने चेहरे की इबारत बस बेजबानी रखता हूँ

मेरे अहबाब मांग ले तू, मेरी जान किसी रोज
देख मैं क्या क्या जज्ब -ऐ -कुर्बानी रखता हूँ

पीता हूँ, बहकता हूँ, ये इनकार नहीं मुझको
घर की दरो दीवार मगर पहचानी रखता हूँ

तुम मेरी ग़ज़लों पे कभी भी दाद दो या न दो
अपने दिल में इज्जत तुमको पुरानी रखता हूँ

मुझे देखके मेरे अपने भी गमजदा न हो जाये
दिल में छुपा के 'राज' ग़मों की वीरानी रखता हूँ

रविवार, जून 21, 2009

सिवा इनके अंदाज शायराना नहीं आता




मैं इश्क करता हूँ पर जताना नहीं आता
दिल में रखता हूँ राज बताना नहीं आता

आँखों में हिज्र का सावन छुपा है कब से
रुत बदलती है मगर बरसाना नहीं आता

खता उसकी भी हो तो खामोश रहता हूँ
गिले शिकवे मासूम पे लगाना नहीं आता

उसको गुलाब कहता हूँ या चाँद कहता हूँ
सिवा इनके अंदाज शायराना नहीं आता

उसके दर पे सहर नहीं पहुँचती जब तक
अपने आँगन का चराग बुझाना नहीं आता

शनिवार, जून 13, 2009

इश्क में दिल हारने वाला



जागती आँखों में उसकी ख्वाब हुआ जाता है
इश्क में दिल हारने वाला कामयाब हुआ जाता है

अहमियत न दो तो ये एक कतरा भर ही है
समझो गर तो अश्क भी सैलाब हुआ जाता है

कैसी है आरजू ये, मेरी कैसी है ये तमन्ना
वो रूबरू भी रहे और दिल बेताब हुआ जाता है

गम हो गर उसे तो अपना सा लगता है वो भी
उसके चेहरे का तबस्सुम नायाब हुआ जाता है

कभी निकल जाती है वो जब बेनकाब बाम पे यूँ
हया में छुपती नाजनीन सा माहताब हुआ जाता है

रविवार, जून 07, 2009

मुझे मनाना नहीं आता....



तुम रूठ जाती हो तो मुझे मनाना नहीं आता
झूठ का खूबसूरत आईना दिखाना नहीं आता...

सच कहता हूँ तो तुम्हारी आँखे नम देखता हूँ
क्या सूरत करूँ मैं, तुमको बहलाना नहीं आता...

इक पागल हूँ, शायद लोग सच ही कहते हैं
गुनाह करता हूँ और मुकर जाना नहीं आता...

तुम हंस दो यही तमन्ना लिए फिरता हूँ
सिवा तुम्हारे मुझे मुस्कराना नहीं आता...

मेरे अल्फाजो को थोडी अहमियत तो दे दो
किसी और ढंग से मुझे जतलाना नहीं आता...

मंगलवार, जून 02, 2009

करी कोशिश कभी...



करी कोशिश कभी लब पे जो तेरे गीत गाने की 
दर्द उभर आया फिर से जुबाँ पे इस दीवाने की ... 

जज्बात -ए - गम मैं छुपा के कैसे रख लू यारो 
नहीं बख्शी खुदा ने नेमत मुझे मुस्कराने की ...

तेरी गलियों से उठ आये तो यही दर मिला मुझको 
बात मस्जिद की नहीं काफिर बात है मयखाने की ...

अब दवा की सूरत में बस ये दर्द मिला करता है 
दिल को रास आने लगी हैं राहें उस गमखाने की ...

उसकी खूबसूरती यूँ ही नहीं हुआ करती है "राज" 
शमा ढलती नहीं जब तक खाख में परवाने की .