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मंगलवार, जून 02, 2009

करी कोशिश कभी...



करी कोशिश कभी लब पे जो तेरे गीत गाने की 
दर्द उभर आया फिर से जुबाँ पे इस दीवाने की ... 

जज्बात -ए - गम मैं छुपा के कैसे रख लू यारो 
नहीं बख्शी खुदा ने नेमत मुझे मुस्कराने की ...

तेरी गलियों से उठ आये तो यही दर मिला मुझको 
बात मस्जिद की नहीं काफिर बात है मयखाने की ...

अब दवा की सूरत में बस ये दर्द मिला करता है 
दिल को रास आने लगी हैं राहें उस गमखाने की ...

उसकी खूबसूरती यूँ ही नहीं हुआ करती है "राज" 
शमा ढलती नहीं जब तक खाख में परवाने की .

शुक्रवार, मई 29, 2009

मैं सहर हूँ




उसकी खुशबू से तरबतर हूँ
एक महकता हुआ शजर हूँ

उसके आरिज पे खिलता हूँ
नम-शबनम सा रात भर हूँ

सारे रिश्तों को पहचानता हूँ
मैं मोहब्बत से आबाद घर हूँ

हालात कुछ भी हो जीता हूँ
रखता फौलाद का जिगर हूँ

एक रोज वो पढ़ेगी देखना
सुनी सुनाई ताजा खबर हूँ

वो शब् मुझसे अब डरती है
मिटा दूंगा उसको मैं सहर हूँ.

बुधवार, मई 27, 2009

जिद कर लेती




काश तुझे अपना बनाने की जिद कर लेती
मैं फिर से यूँ मुस्कराने की जिद कर लेती

तुझे एहसास हो गया होता मेरे जज्ब पे
अपनी खाख से तुझे महकाने की जिद कर लेती

तोड़ देती सारे जहाँ की रस्मे तेरी खातिर
सरे-आम सीने से लगाने की जिद कर लेती

मेरी शिद्दत का ये भी इम्तिहान होता गर
क़यामत तक वादा निभाने की जिद कर लेती

रविवार, मई 10, 2009

तेरा इन्तजार शब् भर रहा



तेरा इन्तजार शब् भर रहा
तू ना जाने कहाँ उलझा रहा

मैं उसी मोड़ पे बैठी रही
तेरी राहों से जो मुड़ता रहा

यूँ तो मैंने खुद को संभाला बहुत
पर आँचल हवा से उड़ता रहा

सहर की जब से आहट हुई
अश्कों से नाता मेरा जुड़ता रहा

रविवार, मई 03, 2009

मेरे दिल की जिद .....




वो मुझसे जख्म खाने की जिद करता है 
फिर भी हर हाल मुस्कराने की जिद करता है 

लेता है कुछ यूँ मेरे हौसलों का इम्तेहान 
के हर चोट पे नमक लगाने की जिद करता है 

ख्वाहिश खिजाओ से रखता है कुछ यूँ 
तनहा शजर पे गुल खिलाने की जिद करता है 

जब के जानता है वो संग है न पिघलेगा 
फिर भी इक बार और आजमाने की जिद करता है 

गर कभी ख्वाब में वो आ जाए भूल से 
नींद को आँख से न जाने की जिद करता है 

संभल के चलते हैं जब मयकदों से भी 
न जाने क्यूँ "राज" लड़खडाने की जिद करता है 

बुधवार, अप्रैल 29, 2009

डर लगता है...




तुझको अपना बना लूं डर लगता है
एक और चोट खा लूं डर लगता है

तू भी कहीं न संगदिल निकल जाए
तुझसे कैसे दिल लगा लूं डर लगता है

मेरे जख्मो को कोई देखने नहीं आता
कैसे हौसला आजमा लूं डर लगता है

तन्हाईयाँ भी अब साथ नहीं देती मेरा
इनसे क्या वादा निभा लूं डर लगता है

है पशेमां वो पर बेवफा तो है न "राज"
ऐतबार कितना उठा लूं डर लगता है.

मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

इक शाम उसकी आँखों से ढल रही होगी




इक शाम उसकी आँखों से ढल रही होगी
हिज्र की रातों में वो बहुत मचल रही होगी...

है नाजुक बदन वो कुछ जियादा ही फिर भी
गम के चराग में रौशनी सी जल रही होगी...

महफिल में बेवजह मेरे नाम के जिक्र पर
सर्द आहें उसकी बर्फ सी पिघल रही होगी...

ना पूछेगी मौसमो से बहारों का वो पता
सेहरा की गर्म रेत पे खामोश चल रही होगी....

के वक़्त भी उसके इन्तेज़ार में रुक गया होगा
और वो हर आहट पे घर से निकल रही होगी...

वो अल्फाज़




उसने जाते जाते
कह दिया था
कि
जल्दी आ जाना
कहीं
देर न हो जाए
''
''
''
''
शायद वो सच कह गयी
"
"
"
"
आज भी
मेरी लाचारी,
बेबस वक़्त,
और
वो अल्फाज़,
उसकी तस्वीर के
खूंटे से टंगे हैं

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

बहुत उदास हूँ



बहुत उदास हूँ एक सदा दे कोई
तनहा कब तक रहूँ उससे मिला दे कोई ...

शब् की तन्हाईयां बिखरी बहुत हैं
सहर का उसको भी पता दे कोई ...

किसी के वादों का ऐतबार क्या करुँ
आके पहले वादे निभा दे कोई ...

मेरे जख्मो की लम्बी दास्ताँ है
कुछ हो इलाज मर्ज की दवा दे कोई ...

इक चिंगारी भी क़यामत ला सकती है
आग के शोलो को न हवा दे कोई ...

कौन देखेगा



अबके इन हवाओं का सफ़र कौन देखेगा 
हम ही ना होंगे तो ये घर कौन देखेगा...

पतझर आएगा तो गुल भी ना होंगे 
तनहा तनहा सा ये शजर कौन देखेगा...

जहाँ तक है नजर जमीं सेहरा हुई है 
घटा बरसेगी भी तो असर कौन देखेगा...

परिंदे छोड़ कर बस्तियां दूर जाने लगे 
शब् बीत भी जाए तो सहर कौन देखेगा...

जिसके दम से अब तक आबाद थी गलियां 
"राज" चला गया तो शहर कौन देखेगा...